ॐ श्री गुरुभ्यो नमः|| गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर: | गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ||

HTML codes

21 August 2016

सम्राट विक्रमादित्य

      सम्राट विक्रमादित्य :------
विक्रम संवत अनुसार विक्रमादित्य आज से 2285 वर्ष पूर्व हुए थे।
विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। नाबोवाहन के पुत्र
राजा गंधर्वसेन भी चक्रवर्ती सम्राट थे। गंधर्वसेन के पुत्र
विक्रमादित्य और भर्तृहरी थे।
विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के
राजसिंहासन पर बैठे। विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता और
उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे।
इनमें कालिदास भी थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े
पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।
उज्जैन के विक्रमादित्य के समय ही विक्रम संवत चलाया गया
था। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राज्य भारतीय
उपमहाद्वीप के अलावा ईरान, इराक और अरब में भी था।
विक्रमादित्य की अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम
किनतोई ने अपनी पुस्तक 'शायर उर ओकुल' में किया है।
विक्रमादित्य के पहले और बाद और ‍भी विक्रमादित्य हुए हैं
जिसके चलते भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। उज्जैन के सम्राट
विक्रमादित्य के बाद 300 ईस्वी में समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त
द्वितीय अथवा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य हुए।
विक्रमादित्य द्वितीय 7वीं सदी में हुए, ‍जो विजयादित्य
(विक्रमादित्य प्रथम) के पुत्र थे। विक्रमादित्य द्वितीय ने भी
अपने समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण बनाए
रखा। विक्रमादित्य द्वितीय के काल में ही लाट देश
(दक्षिणी गुजरात) पर अरबों ने आक्रमण किया। विक्रमादित्य
द्वितीय के शौर्य के कारण अरबों को अपने प्रयत्न में सफलता
नहीं मिली और यह प्रतापी चालुक्य राजा अरब आक्रमण से
अपने साम्राज्य की रक्षा करने में समर्थ रहा।
पल्लव राजा ने पुलकेसन को परास्त कर मार डाला। उसका पुत्र
विक्रमादित्य, जो कि अपने पिता के समान महान शासक था,
गद्दी पर बैठा। उसने दक्षिण के अपने शत्रुओं के विरुद्ध पुन: संघर्ष
प्रारंभ किया। उसने चालुक्यों के पुराने वैभव को काफी हद तक
पुन: प्राप्त किया। यहां तक कि उसका परपोता विक्रमादित्य
द्वितीय भी महान योद्धा था। 753 ईस्वी में विक्रमादित्य व
उसके पुत्र का दंती दुर्गा नाम के एक सरदार ने तख्ता पलट दिया।
उसने महाराष्ट्र व कर्नाटक में एक और महान साम्राज्य की
स्थापना की, जो राष्ट्र कूट कहलाया।
विक्रमादित्य द्वितीय के बाद 15वीं सदी में सम्राट हेमचंद्र
विक्रमादित्य 'हेमू' हुए। माना जाता है कि उज्जैन के
विक्रमादित्य के पूर्व भी एक और विक्रमादित्य हुए थे।
सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के बाद 'विक्रमादित्य पंचम'
सत्याश्रय के बाद कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए।
उन्होंने लगभग 1008 ई. में चालुक्य राज्य की गद्दी को
संभाला। राजा भोज के काल में यही विक्रमादित्य थे।
विक्रमादित्य पंचम ने अपने पूर्वजों की नीतियों का अनुसरण
करते हुए कई युद्ध लड़े। उसके समय में मालवा के परमारों के साथ
चालुक्यों का पुनः संघर्ष हुआ और वाकपतिराज मुञ्ज की
पराजय व हत्या का प्रतिशोध करने के लिए परमार राजा भोज
ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उसे परास्त किया। लेकिन एक
युद्ध में विक्रमादित्य पंचम ने राजा भोज को भी हरा दिया
था।

No comments:

Post a Comment