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21 August 2016

महापद्म

महापद्म :-----
इन्द्रप्रस्थ, अयोध्या, हस्तिनापुर, मथुरा के प्रभाव का ह्रास
होने पर भारत 16 जनपदों में बंट गया। इसमें जो जनपद
शक्तिशाली होता वहीं अन्य जनपदों को अपने तरीके से
संचालित करता था। धीरे-धीरे पाटलीपुत्र, तक्षशिला,
वैशाली गांधार और विजयनगर जैसे साम्राज्यों का उदय हुआ।
माना जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद जन्मेजय के बाद 17
राजाओं ने राज किया। कुछ इतिहाकार अनुसार जन्मेजय की
29वीं पीढ़ी में राजा उदयन हुए।
मगध (पाटलीपुत्र) पर वृहद्रथ के वीर पराक्रमी पुत्र और कृष्ण के
दुश्मनों में से एक जरासंध का शासन था जिसके संबंध यवनों से
घनिष्ठ थे। जरासंध के इतिहास के अंतिम शासक निपुंजय की
हत्या उनके मंत्री सुनिक ने की और उसका पुत्र प्रद्योत मगध के
सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
प्रद्योत वंश के 5 शासकों के अंत के 138 वर्ष पश्चात ईसा से 642
वर्ष पूर्व शिशुनाग मगध के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। उसके बाद
महापद्म ने मगध की बागडोर संभाली और नंद वंश की स्थापना
की। महापद्म, जिन्हें महापद्मपति या उग्रसेन भी कहा जाता
है, समाज के शूद्र वर्ग के थे।
महापद्म ने अपने पूर्ववर्ती शिशुनाग राजाओं से मगध की
बागडोर और सुव्यवस्थित विस्तार की नीति भी जानी।
पुराणों में उन्हें सभी क्षत्रियों का संहारक बतलाया गया है।
महापद्म ने उत्तरी, पूर्वी और मध्यभारत स्थित इक्ष्वाकु,
पांचाल, काशी, हैहय, कलिंग, अश्मक, कौरव, मैथिल, शूरसेन और
वितिहोत्र जैसे शासकों को हराया।
महापद्म के वंश की समाप्ति के बाद मगध पर नंद वंशों का राज
कायम हुआ। पुराणों में नंद वंश का उल्लेख मिलता है, जिसमें
सुकल्प (सहल्प, सुमाल्य) का जिक्र है, जबकि बौद्ध
महाबोधिवंश में आठ नंद राजाओं के नामों का उल्लेख है। इस
सूची में अंतिम शासक धनानंद का उल्लेखनीय है। यह धनानंद
सिकंदर महान का शक्तिशाली समकालीन बताया गया है।
1. उग्रसेन, 2. पंडुक, 3. पंडुगति, 4. भूतपाल, 5. राष्ट्रपाल, 6.
गोविषाणक, 7. दशसिद्धक, 8. कैवर्त, और 9. धन।
इसका उल्लेख स्वतंत्र अभिलेखों में भी प्राप्त होता है, जो नंद
वंश द्वारा गोदावरी घाटी- आंध्रप्रदेश, कलिंग- उड़ीसा तथा
कर्नाटक के कुछ भाग पर कब्जा करने की ओर संकेत करते हैं।
मगध के राजनीतिक उत्थान की शुरुआत ईसा पूर्व 528 से शुरू हुई,
जब बिम्बिसार ने सत्ता संभाली। बिम्बिसार के बाद
अजातशत्रु ने बिम्बिसार के कार्यों को आगे बढ़ाया। गौतम
बुद्ध के समय में मगध में बिंबिसार और तत्पश्चात उसके पुत्र
अजातशत्रु का राज था।
अजातशत्रु ने विज्यों (वृज्जिसंघ) से युद्ध कर पाटलीग्राम में एक
दुर्ग बनाया। बाद में अजातशत्रु के पुत्र उदयन ने गंगा और शोन के
तट पर मगध की नई राजधानी पाटलीपुत्र नामक नगर की
स्थापना की। पाटलीपुत्र के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए नंद वंश
के प्रथम शासक महापद्म नंद ने एक विशाल साम्राज्य की
स्थापना की और मगध साम्राज्य के अंतिम नंद धनानंद ने
उत्तराधिकारी के रूप में सत्ता संभाली। बस इसी अंतिम धनानंद
के शासन को उखाड़ फेंकने के लिए चाणक्य ने शपथ ली थी।
हालांकि धनानंद का नाम कुछ और था लेकिन वह 'धनानंद' नाम
से ज्यादा प्रसिद्ध हुआ।
तमिल भाषा की एक कविता और कथासरित्सागर अनुसार नंद
की '99 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं' का उल्लेख मिलता है। कहा
जाता है कि उसने गंगा नदी की तली में एक चट्टान खुदवाकर
उसमें अपना सारा खजाना गाड़ दिया था।
पुनश्च महानंद के पुत्र महापद्म ने नंद-वंश की नींव डाली। इसके
बाद सुमाल्य आदि आठ नंदों ने शासन किया। महानंद के बाद
नवनंदों ने राज्य किया। धनानंद नंद वंश का अंतिम राजा था।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार अर्जुन के समकालीन जरासंध के
पुत्र सहदेव से लेकर शिशुनाग वंश से पहले के जरासंध वंश के 22
राजा मगध के सिंहासन पर बैठ चुके हैं। उनके बाद 12 शिशुनाग वंश
के बैठे जिनमें छठे और सातवें राजाओं के समकालीन उदयन थे।

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