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23 August 2016

ऋषियों की संख्‍या सात ही क्यों?

ऋषियों की संख्‍या सात ही क्यों?
हर काल में रहे हैं अलग-अलग सप्तर्षि, जानिए कौन किस काल के |
आकाश में ७ तारों का एक मंडल नजर आता है। उन्हें सप्तर्षियों का मंडल कहा जाता है। इसके अतिरिक्त सप्तर्षि से उन ७ तारों का बोध होता है, जो ध्रुव तारे की परिक्रमा करते हैं। उक्त मंडल के तारों के नाम भारत के महान 7 संतों के आधार पर ही रखे गए हैं। वेदों में उक्त मंडल की स्थिति, गति, दूरी और विस्तार की विस्तृत चर्चा मिलती है।
।।सप्त ब्रह्मर्षि, देवर्षि, महर्षि, परमर्षय:।
कण्डर्षिश्च, श्रुतर्षिश्च, राजर्षिश्च क्रमावश:।।
अर्थात:
१. ब्रह्मर्षि,
२. देवर्षि,
३. महर्षि,
४. परमर्षि,
५. काण्डर्षि,
६. श्रुतर्षि और
७. राजर्षि
ये ७ प्रकार के ऋषि होते हैं इसलिए इन्हें सप्तर्षि कहते हैं।
भारतीय ऋषियों और मुनियों ने ही इस धरती पर धर्म, समाज, नगर, ज्ञान, विज्ञान, खगोल, ज्योतिष, वास्तु, योग आदि ज्ञान का प्रचार-प्रसार किया था। दुनिया के सभी धर्म और विज्ञान के हर क्षेत्र को भारतीय ऋषियों का ऋणी होना चाहिए। उनके योगदान को याद किया जाना चाहिए। उन्होंने मानव मात्र के लिए ही नहीं, बल्कि पशु-पक्षी, समुद्र, नदी, पहाड़ और वृक्षों सभी के बारे में सोचा और सभी के सुरक्षित जीवन के लिए कार्य किया। आओ, संक्षिप्त में जानते हैं कि किस काल में कौन से ऋषि थे।
भारत में ऋषियों और गुरु-शिष्य की लंबी परंपरा रही है। ब्रह्मा के पुत्र भी ऋषि थे तो भगवान शिव के शिष्यगण भी ऋषि ही थे। प्रथम मनु स्वायंभुव मनु से लेकर बौद्धकाल तक ऋषि परंपरा के बारे में जानकारी मिलती है। हिन्दू पुराणों ने काल को मन्वंतरों में विभाजित कर प्रत्येक मन्वंतर में हुए ऋषियों के ज्ञान और उनके योगदान को परिभाषित किया है। प्रत्येक मन्वंतर में प्रमुख रूप से ७ प्रमुख ऋषि हुए हैं। विष्णु पुराण के अनुसार इनकी नामावली इस प्रकार है-
१. प्रथम स्वायंभुव मन्वंतर में- मरीचि, अत्रि, अंगिरा, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु और वशिष्ठ।
२. द्वितीय स्वारोचिष मन्वंतर में- ऊर्ज्ज, स्तम्भ, वात, प्राण, पृषभ, निरय और परीवान।
३. तृतीय उत्तम मन्वंतर में- महर्षि वशिष्ठ के सातों पुत्र।
. चतुर्थ तामस मन्वंतर में- ज्योतिर्धामा, पृथु, काव्य, चैत्र, अग्नि, वनक और पीवर।
५. पंचम रैवत मन्वंतर में- हिरण्यरोमा, वेदश्री, ऊर्ध्वबाहु, वेदबाहु, सुधामा, पर्जन्य और महामुनि।
६. षष्ठ चाक्षुष मन्वंतर में– सुमेधा, विरजा, हविष्मान, उतम, मधु, अतिनामा और सहिष्णु।
७. वर्तमान सप्तम वैवस्वत मन्वंतर में- कश्यप, अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भारद्वाज।
*भविष्य* में –
१. अष्टम सावर्णिक मन्वंतर में- गालव, दीप्तिमान, परशुराम, अश्वत्थामा, कृप, ऋष्यश्रृंग और व्यास।
२. नवम दक्षसावर्णि मन्वंतर में- मेधातिथि, वसु, सत्य, ज्योतिष्मान, द्युतिमान, सबन और भव्य।
३. दशम ब्रह्मसावर्णि मन्वंतर में- तपोमूर्ति, हविष्मान, सुकृत, सत्य, नाभाग, अप्रतिमौजा और सत्यकेतु।
४. एकादश धर्मसावर्णि मन्वंतर में- वपुष्मान्, घृणि, आरुणि, नि:स्वर, हविष्मान्, अनघ और अग्नितेजा।
५. द्वादश रुद्रसावर्णि मन्वंतर में- तपोद्युति, तपस्वी, सुतपा, तपोमूर्ति, तपोनिधि, तपोरति और तपोधृति।
६. त्रयोदश देवसावर्णि मन्वंतर में- धृतिमान, अव्यय, तत्वदर्शी, निरुत्सुक, निर्मोह, सुतपा और निष्प्रकम्प।
७. चतुर्दश इन्द्रसावर्णि मन्वंतर में- अग्नीध्र, अग्नि, बाहु, शुचि, युक्त, मागध, शुक्र और अजित।
इन ऋषियों में से कुछ कल्पान्त-चिरजीवी, मुक्तात्मा और दिव्यदेहधारी हैं।
*शतपथ ब्राह्मण* के अनुसार
१. गौतम,
२. भारद्वाज,
३. विश्वामित्र,
४. जमदग्नि,
५. वसिष्ठ,
६. कश्यप और
७. अत्रि।
*महाभारत* के अनुसार
१. मरीचि,
२ . अत्रि,
३. अंगिरा,
४. पुलह,
५. क्रतु,
६. पुलस्त्य और
७. वसिष्ठ सप्तर्षि माने गए हैं।
महाभारत में राजधर्म और धर्म के प्राचीन आचार्यों के नाम इस प्रकार हैं– बृहस्पति, विशालाक्ष (शिव), शुक्र, सहस्राक्ष, महेन्द्र, प्राचेतस मनु, भरद्वाज और गौरशिरस मुनि।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में इनकी सूची इस प्रकार है- मनु, बृहस्पति, उशनस (शुक्र), भरद्वाज, विशालाक्ष (शिव), पराशर, पिशुन, कौणपदंत, वातव्याधि और बहुदंती पुत्र।
वैवस्वत मन्वंतर में वशिष्ठ ऋषि हुए। उस मन्वंतर में उन्हें ब्रह्मर्षि की उपाधि मिली। वशिष्ठजी ने गृहस्थाश्रम की पालना करते हुए ब्रह्माजी के मार्गदर्शन में उन्होंने सृष्टि वर्धन, रक्षा, यज्ञ आदि से संसार को दिशाबोध दिया।

21 August 2016

छन्दः पद का निर्वचन

                   छन्दः पद का निर्वचन

प्राचीन वाङ्मय में "छन्द" पद का अनेका प्रकार का निर्वचन उपलब्ध होता है । यथा---

(१.) सामवेदीय दैवत ब्राह्मण में छन्दः पद का निर्वचन इस प्रकार लिखा है---
"छन्दांसि छन्यतीति वा" (१.३)
अर्थात् छन्दः पद का छन्द (छदि) चौरादिक धातु से निष्पन्न होता है ।

(२.) तैत्तिरीय संहिता (५.६.६.१) में----
"ते छन्दोभिरात्मानं छादयित्वोपार्यस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ।"

(३.) शतपथ-ब्राह्मण (८.५.२.१) में---
"यदस्मा अच्छदर्यस्तास्माच्छन्दांसि ।"

(४.) छान्दोग्योपनिषद् (१.४.२) में---
"देवा वै मृत्योर्बिभ्यतस्त्रयीं विद्यां प्राविशँस्ते छन्दोभिरच्छादयन्, यदेभिरच्छादयैस्तच्छन्दसां छन्दस्त्वम् ।"

इन (२--४) उद्धरणों में "छन्दः" पद का निर्वचन "छद" धातु से दर्शाया है ।

(५.) निरुक्त (७.१२) में लिखा है---
"छन्दांसि छादनात् ।"
अर्थात् छन्दः नाम छादन (आच्छादन--ढाँपने) के कारण है ।

(६.) गार्ग्य ने उपनिदान सूत्र में लिखा है---
"यस्माच्छादिता देवाश्छन्दोभिर्मृत्युभीरवः ।
छन्दसां तेन छन्दस्त्वं ख्यायते वेदवादिभिः ।।"

अर्थात् जिस कारण मृत्यु से डरे हुए देवों ने (स्वयं को) छिपाया, इस कारण छन्दों का यही छन्दःपन वेदवादी ऋषियों से प्रकट किया जाता है ।

(७.) उणादि सूत्र में छन्दः पद का साधुत्वनिदर्शक सूत्र इस प्रकार है---
"चन्देरादेश्च छः ।" पञ्चपादी (४.२१९), दशपादी (९.७८)
अर्थात्---चदि (चन्द) धातु से "असि" प्रत्यय होता है और धातु के आदि वर्ण चकार को छकार हो जाता है ।

(८.) जयदेव कृत छन्दःसूत्र का विवृतिकार हर्षट लिखता है---
"चन्दति ह्लादं करोति दीप्यते वा श्रव्यतया इति छन्दः ।"(२.१)
अर्थात्---जो आनन्दित करता है, अथवा सुनने योग्य होने से दीप्त (प्रकाशित) होता है, उसे छन्द कहते हैं ।

इस व्युत्पत्ति में भी "चदि आह्लादने दीप्तौ च" धातु से छन्दः पद की निरुक्ति दर्शायी है ।

(९.) पाणिनीय धातुपाठ की पश्चिमोत्तर शाखा का व्याख्याता क्षीरस्वामी (१२ वीं शती वि.) अमरकोश की व्याख्या में छन्दस् और छन्द पद की व्युत्पत्ति इस प्रकार लिखता है---
(क) "छन्दति छन्दः (छन्दस्) ।" (२.७.२२), (३.३.२३२)
(ख) "छन्दयति आह्लादयते छन्दः, अच" । (३.२.२०)

इन व्युत्पत्तियों में क्षीरस्वामी ने "छन्दस्" की व्युत्पत्ति भौवादिक छन्द (छदि) धातु से, तथा "छन्द" की णिजन्त छन्द (छदि) धातु से दर्शायी है ।

(१०.) सायण धातुवृत्ति में "छन्दः" पद की निष्पत्ति "छदि" धातु से मानता है ।

उपरिनिर्दिष्ट व्युत्पत्तियों के अनुसार "छन्दः" पद निम्न धातुओं से निष्पन्न माना गया है---

(क) छन्द (छदि) भौवादिक
(ख) छन्द (छदि) चौरादिक,
(ग) छद चौरादिक
(घ) चन्द (चदि) भौवादिक,
(ङ) छन्द (अकारान्त) की छन्द (छदि) णिजन्त से ।

चन्द्रगुप्त द्वितीय

   चन्द्रगुप्त द्वितीय  :-----

गुप्त काल को भारत का स्वर्ण काल कहा जाता है। गुप्त वंश

की स्थापना चन्द्रगुप्त प्रथम ने की थी। आरंभ में इनका शासन

केवल मगध पर था, पर बाद में गुप्त वंश के राजाओं ने संपूर्ण उत्तर

भारत को अपने अधीन करके दक्षिण में कांजीवरम के राजा से

भी अपनी अधीनता स्वीकार कराई।

समुद्रगुप्त का पुत्र 'चन्द्रगुप्त द्वितीय' समस्त गुप्त राजाओं में

सर्वाधिक शौर्य एवं वीरोचित गुणों से संपन्न था। शकों पर

विजय प्राप्त करके उसने 'विक्रमादित्य' की उपाधि धारण

की। वह 'शकारि' भी कहलाया। मालवा, काठियावाड़,

गुजरात और उज्जयिनी को अपने साम्राज्य में मिलाकर उसने

अपने पिता के राज्य का और भी विस्तार किया। चीनी

यात्री फाह्यान उसके समय में 6 वर्षों तक भारत में रहा।

चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य का शासनकाल भारत के इतिहास का

बड़ा महत्वपूर्ण समय माना जाता है।

चन्द्रगुप्त द्वितीय के समय में गुप्त साम्राज्य अपनी शक्ति की

चरम सीमा पर पहुंच गया था। दक्षिणी भारत के जिन राजाओं

को समुद्रगुप्त ने अपने अधीन किया था, वे अब भी अविकल रूप से

चन्द्रगुप्त की अधीनता स्वीकार करते थे। शक-महाक्षत्रपों और

गांधार-कम्बोज के शक-मुरुण्डों के परास्त हो जाने से गुप्त

साम्राज्य का विस्तार पश्चिम में अरब सागर तक और हिन्दूकुश

के पार वंक्षु नदी तक हो गया था।

 

सम्राट विक्रमादित्य

      सम्राट विक्रमादित्य :------
विक्रम संवत अनुसार विक्रमादित्य आज से 2285 वर्ष पूर्व हुए थे।
विक्रमादित्य का नाम विक्रम सेन था। नाबोवाहन के पुत्र
राजा गंधर्वसेन भी चक्रवर्ती सम्राट थे। गंधर्वसेन के पुत्र
विक्रमादित्य और भर्तृहरी थे।
विक्रमादित्य भारत की प्राचीन नगरी उज्जयिनी के
राजसिंहासन पर बैठे। विक्रमादित्य अपने ज्ञान, वीरता और
उदारशीलता के लिए प्रसिद्ध थे जिनके दरबार में नवरत्न रहते थे।
इनमें कालिदास भी थे। कहा जाता है कि विक्रमादित्य बड़े
पराक्रमी थे और उन्होंने शकों को परास्त किया था।
उज्जैन के विक्रमादित्य के समय ही विक्रम संवत चलाया गया
था। उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य का राज्य भारतीय
उपमहाद्वीप के अलावा ईरान, इराक और अरब में भी था।
विक्रमादित्य की अरब विजय का वर्णन अरबी कवि जरहाम
किनतोई ने अपनी पुस्तक 'शायर उर ओकुल' में किया है।
विक्रमादित्य के पहले और बाद और ‍भी विक्रमादित्य हुए हैं
जिसके चलते भ्रम की स्थिति उत्पन्न होती है। उज्जैन के सम्राट
विक्रमादित्य के बाद 300 ईस्वी में समुद्रगुप्त के पुत्र चन्द्रगुप्त
द्वितीय अथवा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य हुए।
विक्रमादित्य द्वितीय 7वीं सदी में हुए, ‍जो विजयादित्य
(विक्रमादित्य प्रथम) के पुत्र थे। विक्रमादित्य द्वितीय ने भी
अपने समय में चालुक्य साम्राज्य की शक्ति को अक्षुण्ण बनाए
रखा। विक्रमादित्य द्वितीय के काल में ही लाट देश
(दक्षिणी गुजरात) पर अरबों ने आक्रमण किया। विक्रमादित्य
द्वितीय के शौर्य के कारण अरबों को अपने प्रयत्न में सफलता
नहीं मिली और यह प्रतापी चालुक्य राजा अरब आक्रमण से
अपने साम्राज्य की रक्षा करने में समर्थ रहा।
पल्लव राजा ने पुलकेसन को परास्त कर मार डाला। उसका पुत्र
विक्रमादित्य, जो कि अपने पिता के समान महान शासक था,
गद्दी पर बैठा। उसने दक्षिण के अपने शत्रुओं के विरुद्ध पुन: संघर्ष
प्रारंभ किया। उसने चालुक्यों के पुराने वैभव को काफी हद तक
पुन: प्राप्त किया। यहां तक कि उसका परपोता विक्रमादित्य
द्वितीय भी महान योद्धा था। 753 ईस्वी में विक्रमादित्य व
उसके पुत्र का दंती दुर्गा नाम के एक सरदार ने तख्ता पलट दिया।
उसने महाराष्ट्र व कर्नाटक में एक और महान साम्राज्य की
स्थापना की, जो राष्ट्र कूट कहलाया।
विक्रमादित्य द्वितीय के बाद 15वीं सदी में सम्राट हेमचंद्र
विक्रमादित्य 'हेमू' हुए। माना जाता है कि उज्जैन के
विक्रमादित्य के पूर्व भी एक और विक्रमादित्य हुए थे।
सम्राट हेमचंद्र विक्रमादित्य के बाद 'विक्रमादित्य पंचम'
सत्याश्रय के बाद कल्याणी के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए।
उन्होंने लगभग 1008 ई. में चालुक्य राज्य की गद्दी को
संभाला। राजा भोज के काल में यही विक्रमादित्य थे।
विक्रमादित्य पंचम ने अपने पूर्वजों की नीतियों का अनुसरण
करते हुए कई युद्ध लड़े। उसके समय में मालवा के परमारों के साथ
चालुक्यों का पुनः संघर्ष हुआ और वाकपतिराज मुञ्ज की
पराजय व हत्या का प्रतिशोध करने के लिए परमार राजा भोज
ने चालुक्य राज्य पर आक्रमण कर उसे परास्त किया। लेकिन एक
युद्ध में विक्रमादित्य पंचम ने राजा भोज को भी हरा दिया
था।

सम्राट अशोक

सम्राट अशोक :----
अशोक महान प्राचीन भारत में मौर्य राजवंश के राजा थे।
अशोक के दादा का नाम चन्द्रगुप्त मौर्य था और पिता का
नाम बिंदुसार था। बिंदुसार की मृत्यु 272 ईसा पूर्व हुई थी
जिसके बाद अशोक राजगद्दी पर बैठे।
अशोक महान के समय मौर्य राज्य उत्तर में हिन्दुकुश की
श्रेणियों से लेकर दक्षिण में गोदावरी नदी के दक्षिण तथा मैसूर
तक तथा पूर्व में बंगाल से लेकर पश्चिम में अफगानिस्तान तक
था। बस वह कलिंग के राजा को अपने अधिन नहीं कर पाया था।
कलिंग युद्ध के बाद अशोक महान गौतम बुद्ध की शरण में चले गए थे।
महात्मा बुद्ध की स्मृति में उन्होंने एक स्तम्भ खड़ा कर दिया,
जो आज भी नेपाल में उनके जन्मस्थल लुम्बिनी में मायादेवी
मंदिर के पास अशोक स्तम्भ के रूप में देखा जा सकता है।
सम्राट अशोक को अपने विस्तृत साम्राज्य के बेहतर कुशल
प्रशासन तथा बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए जाना जाता है।
अशोक के काल में बौद्ध धर्म की जड़ें मिस्र, सऊदी अरब, इराक,
यूनान से लेकर श्रीलंका और बर्मा, थाईलैंड, चीन आदि क्षेत्र में
गहरी जम गई थीं।

सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य

सम्राट चन्द्रगुप्त मौर्य :-----
सम्राट चन्द्रगुप्त महान थे। उन्हें चन्द्रगुप्त महान कहा जाता है।
सिकंदर के काल में हुए चन्द्रगुप्त ने सिकंदर के सेनापति सेल्युकस
को दो बार बंधक बनाकर छोड़ दिया था। सम्राट चन्द्रगुप्त
मौर्य के गुरु चाणक्य थे। चन्द्रगुप्त मौर्य ने सेल्युकस की पुत्री
हेलन से विवाह किया था। चन्द्रगुप्त की एक भारतीय पत्नी
दुर्धरा थी जिससे बिंदुसार का जन्म हुआ।
चन्द्रगुप्त ने अपने पुत्र बिंदुसार को गद्दी सौंप दी थीं। बिंदुसार
के समय में चाणक्य उनके प्रधानमंत्री थे। इतिहास में बिंदुसार को
'पिता का पुत्र और पुत्र का पिता' कहा जाता है, क्योंकि वे
चन्द्रगुप्त मौर्य के पुत्र और राजा अशोक महान के पिता थे।
चाणक्य और पौरस की सहायता से चन्द्रगुप्त मौर्य मगध के
सिंहासन पर बैठे और चन्द्रगुप्त ने यूनानियों के अधिकार से
पंजाब को मुक्त करा लिया। चन्द्रगुप्त मौर्य का शासन-प्रबंध
बड़ा व्यवस्थित था। इसका परिचय यूनानी राजदूत मेगस्थनीज
के विवरण और कौटिल्य के 'अर्थशास्त्र' से मिलता है।
चन्द्रगुप्त महान के प्रारंभिक जीवन के बारे में जानकारी हमें जैन
और बौद्ध ग्रंथों से प्राप्त होती है। विशाखदत्त के नाटक
'मुद्राराक्षस' में चन्द्रगुप्त को नंदपुत्र न कहकर मौर्यपुत्र कहा
गया है। चन्द्रगुप्त मुरा नाम की भील महिला के पुत्र थे। यह
महिला धनानंद के राज्य में नर्तकी थी जिससे राजाज्ञा से
राज्य छोड़कर जाने का आदेश दिया गया था और वह महिला
जंगल में रहकर जैसे-तैसे अपने दिन गुजार रही थी।
चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र था।
16 महाजनपदों में बंटे भारत में उसका जनपद सबसे शक्तिशाली
था। चन्द्रगुप्त से पूर्व मगध पर क्रूर धनानंद का शासन था, जो
बिम्बिसार और अजातशत्रु का वंशज था।

राजा युधिष्ठिर


                  राजा युधिष्ठिर :--------

पांडव पुत्र युधिष्ठिर को धर्मराज भी कहते थे। इनका जन्म
धर्मराज के संयोग से कुंती के गर्भ द्वारा हुआ था। महाभारत
युद्ध के बाद युधिष्ठिर ने ही भारत पर राज किया था। 2964 ई.
पूर्व युधिष्ठिर का राज्यारोहण हुआ था।
युधिष्ठिर भाला चलाने में निपुण थे। वे कभी मिथ्या नहीं
बोलते थे। उनके पिता ने यक्ष बनकर सरोवर पर उनकी 


         परीक्षा भी ली थी। महाभारत युद्ध में धर्मराज युधिष्ठिर साथ अक्षौहिणी सेना के 
            स्वामी होकर कौरवों के साथ युद्ध करने को तैयार हुए थे, जबकि परम क्रोधी दुर्योधन ग्यारह

अक्षौहिणी सेना का स्वामी था।
महाभारत युद्ध के बाद युधिष्ठिर को राज्य, धन, वैभव से वैराग्य
हो गया था। वे वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहते थे किंतु
समस्त भाइयों तथा द्रौपदी ने उन्हें तरह-तरह से समझाकर
                        क्षात्रधर्म का पालन करने के लिए प्रेरित किया। उनके शासनकाल में संपूर्ण                              भारतीय उपमहाद्वीप पर शांति और खुशहाली रही।
युधिष्ठिर सहित पांचों पांडव अर्जुन पुत्र अभिमन्यु के पुत्र
महापराक्रमी परीक्षित को राज्य देकर महाप्रयाण हेतु
उत्तराखंड की ओर चले गए और वहां जाकर पुण्यलोक को प्राप्त हुए। परीक्षित के बाद उनके पुत्र जन्मेजय ने राज्य संभाला। महाभारत में जन्मेजय के छः और भाई बताए गए हैं। ये भाई हैं कक्षसेन, उग्रसेन, चित्रसेन, इन्द्रसेन, सुषेण तथा नख्यसेन।

महापद्म

महापद्म :-----
इन्द्रप्रस्थ, अयोध्या, हस्तिनापुर, मथुरा के प्रभाव का ह्रास
होने पर भारत 16 जनपदों में बंट गया। इसमें जो जनपद
शक्तिशाली होता वहीं अन्य जनपदों को अपने तरीके से
संचालित करता था। धीरे-धीरे पाटलीपुत्र, तक्षशिला,
वैशाली गांधार और विजयनगर जैसे साम्राज्यों का उदय हुआ।
माना जाता है कि महाभारत युद्ध के बाद जन्मेजय के बाद 17
राजाओं ने राज किया। कुछ इतिहाकार अनुसार जन्मेजय की
29वीं पीढ़ी में राजा उदयन हुए।
मगध (पाटलीपुत्र) पर वृहद्रथ के वीर पराक्रमी पुत्र और कृष्ण के
दुश्मनों में से एक जरासंध का शासन था जिसके संबंध यवनों से
घनिष्ठ थे। जरासंध के इतिहास के अंतिम शासक निपुंजय की
हत्या उनके मंत्री सुनिक ने की और उसका पुत्र प्रद्योत मगध के
सिंहासन पर आरूढ़ हुआ।
प्रद्योत वंश के 5 शासकों के अंत के 138 वर्ष पश्चात ईसा से 642
वर्ष पूर्व शिशुनाग मगध के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुआ। उसके बाद
महापद्म ने मगध की बागडोर संभाली और नंद वंश की स्थापना
की। महापद्म, जिन्हें महापद्मपति या उग्रसेन भी कहा जाता
है, समाज के शूद्र वर्ग के थे।
महापद्म ने अपने पूर्ववर्ती शिशुनाग राजाओं से मगध की
बागडोर और सुव्यवस्थित विस्तार की नीति भी जानी।
पुराणों में उन्हें सभी क्षत्रियों का संहारक बतलाया गया है।
महापद्म ने उत्तरी, पूर्वी और मध्यभारत स्थित इक्ष्वाकु,
पांचाल, काशी, हैहय, कलिंग, अश्मक, कौरव, मैथिल, शूरसेन और
वितिहोत्र जैसे शासकों को हराया।
महापद्म के वंश की समाप्ति के बाद मगध पर नंद वंशों का राज
कायम हुआ। पुराणों में नंद वंश का उल्लेख मिलता है, जिसमें
सुकल्प (सहल्प, सुमाल्य) का जिक्र है, जबकि बौद्ध
महाबोधिवंश में आठ नंद राजाओं के नामों का उल्लेख है। इस
सूची में अंतिम शासक धनानंद का उल्लेखनीय है। यह धनानंद
सिकंदर महान का शक्तिशाली समकालीन बताया गया है।
1. उग्रसेन, 2. पंडुक, 3. पंडुगति, 4. भूतपाल, 5. राष्ट्रपाल, 6.
गोविषाणक, 7. दशसिद्धक, 8. कैवर्त, और 9. धन।
इसका उल्लेख स्वतंत्र अभिलेखों में भी प्राप्त होता है, जो नंद
वंश द्वारा गोदावरी घाटी- आंध्रप्रदेश, कलिंग- उड़ीसा तथा
कर्नाटक के कुछ भाग पर कब्जा करने की ओर संकेत करते हैं।
मगध के राजनीतिक उत्थान की शुरुआत ईसा पूर्व 528 से शुरू हुई,
जब बिम्बिसार ने सत्ता संभाली। बिम्बिसार के बाद
अजातशत्रु ने बिम्बिसार के कार्यों को आगे बढ़ाया। गौतम
बुद्ध के समय में मगध में बिंबिसार और तत्पश्चात उसके पुत्र
अजातशत्रु का राज था।
अजातशत्रु ने विज्यों (वृज्जिसंघ) से युद्ध कर पाटलीग्राम में एक
दुर्ग बनाया। बाद में अजातशत्रु के पुत्र उदयन ने गंगा और शोन के
तट पर मगध की नई राजधानी पाटलीपुत्र नामक नगर की
स्थापना की। पाटलीपुत्र के राजसिंहासन पर आरूढ़ हुए नंद वंश
के प्रथम शासक महापद्म नंद ने एक विशाल साम्राज्य की
स्थापना की और मगध साम्राज्य के अंतिम नंद धनानंद ने
उत्तराधिकारी के रूप में सत्ता संभाली। बस इसी अंतिम धनानंद
के शासन को उखाड़ फेंकने के लिए चाणक्य ने शपथ ली थी।
हालांकि धनानंद का नाम कुछ और था लेकिन वह 'धनानंद' नाम
से ज्यादा प्रसिद्ध हुआ।
तमिल भाषा की एक कविता और कथासरित्सागर अनुसार नंद
की '99 करोड़ स्वर्ण मुद्राओं' का उल्लेख मिलता है। कहा
जाता है कि उसने गंगा नदी की तली में एक चट्टान खुदवाकर
उसमें अपना सारा खजाना गाड़ दिया था।
पुनश्च महानंद के पुत्र महापद्म ने नंद-वंश की नींव डाली। इसके
बाद सुमाल्य आदि आठ नंदों ने शासन किया। महानंद के बाद
नवनंदों ने राज्य किया। धनानंद नंद वंश का अंतिम राजा था।
कुछ इतिहासकारों के अनुसार अर्जुन के समकालीन जरासंध के
पुत्र सहदेव से लेकर शिशुनाग वंश से पहले के जरासंध वंश के 22
राजा मगध के सिंहासन पर बैठ चुके हैं। उनके बाद 12 शिशुनाग वंश
के बैठे जिनमें छठे और सातवें राजाओं के समकालीन उदयन थे।

20 August 2016

राजा भरत


             राजा भरत :-----
पुरुवंश के राजा दुष्यंत और शकुंतला के पुत्र भरत की गणना
'महाभारत' में वर्णित सोलह सर्वश्रेष्ठ राजाओं में होती है।
राजा भरत को 'सर्वदमन' भी कहा जाता था, क्योंकि उन्होंने
बचपन में ही बड़े-बड़े राक्षसों, दानवों और सिंहों का दमन
किया था। सम्राट भरत का शासन संपूर्ण भारतीय
उपमहाद्वीप पर था।
महाभारत के अनुसार भरत ने यमुना, सरस्वती और गंगा के तट पर बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान
 किया तथा महर्षि भारद्वाज की कृपा से भूमन्यु नामक पुत्र प्राप्त किया। भरत के देहावसान के बाद 
उसने अपने पुत्र वितथ को राज्य का भार सौंप दिया और स्वयं वन में चला गया।
श्रीमद् भागवत अनुसार भरत का विवाह विदर्भराज की तीन
कन्याओं से हुआ था जिनसे उन्हें तीन पुत्रों की प्राप्ति हुई।
तीनों पुत्रों से कोई वंश चलता नहीं देख भारत ने 'मरूत्स्तोम'
यज्ञ किया। मरूद्गणों ने भरत को भारद्वाज नामक पुत्र दिया।
भारद्वाज का वंश चला।
इन्हीं भरत के कुल में शांतनु हुए। शांतनु की पत्नी गंगा के पुत्र
भीष्म थे और शांतनु की दूसरी पत्नी सत्यवती के दो पुत्र हुए-
चित्रांगद और विचित्रवीर्य। ‍भीष्म ने भीष्म प्रतिज्ञा ली थी
इसलिए उनका वंश नहीं चला। चित्रांगद तो गंधर्वों से युद्ध करते हुए मारा गया।
 विचित्रवीर्य की दो पत्नियां अम्बिका और
अम्बालिका थीं। विचित्रवीर्य कामी और सुरापेयी था। उसे
राजयक्ष्मा हो गया और वह असमय में ही मृत्यु को प्राप्त हुआ।
सत्यवती और भीष्म को कुल और वंश नष्ट होने की चिंता होने
लगी तब सत्यवती ने राजमाता होने के कारण व्यास द्वैपायन
को बुलवाया, जो पुत्र दे सके। सत्यवती की कुमारी अवस्था में
ही व्यास द्वैपायन का जन्म हुआ था।
समागम के समय व्यास की कुरूपता को देखकर अम्बिका ने नेत्र मूंद लिए। अत: उसका
 पुत्र धृतराष्ट्र जन्मांध पैदा हुआ।
अम्बालिका व्यास को देखकर पीतवर्णा हो गई, इससे उसका
पुत्र पाण्डु पीला हुआ। सत्यवती ने एक और पुत्र की कामना से
अम्बिका को व्यास के पास भेजा, लेकिन उसने अपनी दासी
को भेज दिया। दासी से विदुर का जन्म हुआ। इस तरह देखा जाए तो भरतवंश की जगह बाद में व्यास
 द्वैपायन का वंश चला।