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03 October 2015

उपमा कालिदासस्य

उपमा कालिदासस्य
'उपमा कालिदासस्य' का अभिप्राय यह नहीं है कि किसी
अन्य कवि ने सादृश्यमूलक अलंकारों से अपनी कविता को
अलंकृत नहीं किया है । फिर कालिदास के लिए यह क्यों ?
कालिदास इस क्षेत्र में अनूठे जो हैं ! आइए, इसे समझने के लिए
संगत विषय पर कुछ परोक्ष चिन्तन कर लिया जाय ।
एक व्यक्ति एक फूलदार पौधे का रोपण करने के लिए पहले बहुत
अच्छी तरह मिट्टी तैयार करता है । फिर हल्की-सी सिंचाई
करके उसमें उस पौधे के बीजों को बोता है, फिर धूप और पानी
का निरन्तर ख़याल रखता है और आवश्यकतानुसार ही देशी खाद
भी डालता है । जब बीजांकुर धरती का पेट चीर कर झाँकने लगते
हैं तब वह उसकी लगातार सावधानी से देखभाल करता है ताकि
सही समय आने पर उसमें सुन्दर फूल खिल सकें । और, वह पल आता है
जब परिश्रम सार्थक होता है और सुगन्धित फूल खिलकर सारे
परिवेश को सुरम्य और सुरभित कर देते हैं । इन सुशोभन फूलों पर
अनेकों जीव अपनी जान छिड़कते हैं और उन पर अपना हार्दिक
उल्लास निछावर करते हैं । इसका सुपरिणाम यह होता है कि यह
सुन्दर पुष्पावली रसीले मधुर फलों के गुच्छों में रूपान्तरित हो
जाती है ।
एक दूसरा व्यक्ति इसे देखता है और वह पेड़ ही बाज़ार से ख़रीद
लाता है । सही देखभाल के अभाव में इस पेड़ पर या तो फूल आते
ही नहीं या बहुत ही छोटे अल्पविकसित अनाकर्षक फूल आते हैं ।
उसे पहले वाले व्यक्ति से ईर्ष्या होती है और वह बाज़ार से कुछ
फूल और फल ख़रीद कर लाता है तथा दर्शकों से छिपाकर उन्हें
पेड़ पर यत्र-तत्र लटका देता है । पर बाज़ार से ख़रीदे हुए फूल और
फल वह प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाते और शीघ्र ही उसकी पोल
खुल जाती है ।
एक तीसरा व्यक्ति तो इन सबका बाप निकला । वह नक़ली पेड़
ही घर पर ले आया और उसमें नक़ली फूल और नक़ली फल लटका
दिये ।
यही अन्तर है कालिदास के अलंकार-विधान में और अन्य कवियों
की अलंकार-योजना में । कालिदास को अलंकारों का कोई
लोभ-लालच नहीं, उनकी कविता तो सहज लावण्यवती है ।
किसी रूपवती स्त्री को आभूषणों से सज्जित होने की उतनी
ललक नहीं होती जितनी कि कुरूपा को होती है । वह दिन-भर
रूप-सिंगार करने में, न जाने, कितने प्रकार के यत्न करती रहती है
पर सहज रूप-सौन्दर्य के आकर्षण को कभी पा नहीं पाती ।
कालिदास के काव्य की भूमि ही अलंकारों के लिए उर्वरा है ।
वे काव्य-सृजन के मामले में सच्चे निष्काम कर्मयोगी हैं और फल
की क़तई चिन्ता नहीं करते । वह नहीं सोचते कि अलंकार सजाने
हैं इसलिए ऐसी भूमिका बनाएँ कि अलंकार सजाने का अवसर
बन जाए, अपितु वे तो काव्य की सम्प्रेषणीयता पर ही ज़्यादा
केन्द्रित रहते हैं । पाठक कहीं बिदक न जाए, कहीं उनकी
कविता बोझिल न हो जाए और पाठक पढ़ने से ही विमुख न हो
जाए, इसी पर सतत ध्यान रखते हैं कालिदास । अलंकारों के
नाहक बोझ से कविता की गतिशीलता ही ख़त्म हो जाती है ।
इसके लिए सहजता ही ज़्यादा ज़रूरी होती है, न कि अलंकार ।
जैसे सम्पूर्ण तैयारी के साथ पेड़ उगाने वाले माली को सुन्दर-
सुगन्धित फूलों और सुमधुर फलों का उपहार मिलना तय है, वह
फूलों के लिए उतना चिन्तित नहीं रहता जितना कि पेड़ के
स्वास्थ्य के प्रति होता है, वैसे ही सहज-सहज स्वाभाविक
रीति से किये गये कालिदास के काव्य में अलंकारों के साथ
पाठक की सुरुचि की निरन्तरता के फूल अवश्य खिलते ही हैं ।
जैसे सिंचित उपजाऊ भूमि में वन-सम्पदा बिना प्रयास के उग
आती है, वैसे ही कालिदास को अलंकारों के लिए अलग से श्रम
करना नहीं पड़ता है, अलंकार तो उनके काव्य की उपजाऊ
मिट्टी में अपना सौन्दर्य बिखरने के लिए सदैव उतावले रहते ही हैं
। सहजता ही काव्य-सौन्दर्य की जननी है, पर कलाबाजियों के
शौक़ीन अन्य कवियों को यह बात समझ ही नहीं आई और वे
सम्प्रेषण को छोड़कर व्यर्थ ही कविता को अलंकारों के नक़ली
सौन्दर्य से अपने काव्य को अलंकृत करने में जुट गये फलत: लाख
कलाबाज़ी करके भी वे कालिदास की बराबरी नहीं पा सके ।
अरे, बराबरी तो दूर, पास खड़े होने की भी ज़ुर्रत उनमें नहीं हैं ! मैंने
एक दिन पहले भी कहा था कि कालिदास को अपने प्रिय
पाठकों का बहुत ख़याल है और यही एक तत्त्व है जो उनकी
सर्वोच्चता का झण्डा कभी झुकने नहीं देता है । पदे-पदे
लालित्यं की जगह पदे-पदे सहजता कालिदास के काव्य का मूल
प्राण है । सहजता है तो लालित्य तो आएगा ही ! हिन्दी के
छात्र जानते हैं कि इसी सहजता के कारण मुंशी प्रेमचन्द कथा-
सम्राट् कहे जाते हैं ।
सहजता कोई बाहर से थोपी जाने वाली वस्तु नहीं है । वह तो
हमारा सबका स्वभाव है, वह हमारे साथ ही जन्मा है — सह + ज
= सहज, साथ जन्मा । जो हमारे स्वभाव का हिस्सा ही है, वह
हमें चाहे जहाँ दिखे या न दिखे, पर हमें आसानी से अंगीकृत हो
ही जाता है, सुगमता से स्वीकार्य हो ही जाता है । ट्रेन में एक
अजनबी भी हमारा अपना बन जाता है और हमारा मन जीत
लेता है, इसी सहजता के कारण । सहज कृत्य को समझने में हमारे
मन को कोई कसरत करनी नहीं पड़ती, वह तो ऐसे ही वहाँ
फिसलने लगता है जैसे गीले शीशे पर पैर फिसलता है । कालिदास
सृजन के समय पाठक-मन की इसी सहजता पर केन्द्रित रहते हैं और
जब देखते हैं कि वह काव्य-रस से सराबोर है, अलंकारों को ऐसे ही
धीरे-से उसमें खिसका देते हैं जैसे कोई शक्कर की चाशनी
( syrup ) में सुगन्ध की कुछ बूँदें टपका दे तो उसकी मधुरता सुरभित
भी हो जाती है और रसपान करने वाले के आनन्दातिरेक को
बढ़ा देती है । बाक़ी कवियों का हाल मत पूछो, वे करेले का रस
तैयार करते हैं और उसमें सुगन्ध डालने की कुचेष्टा करते हैं !
अलंकारों से उनकी कड़वी कविता और भी ज़्यादा त्याज्य हो
जाती है !
अक्सर कालिदास के 'मेघदूतम्' और महाकवि माघ के काव्य के
विषय में प्रसिद्ध टीकाकार मल्लिनाथ का यह जुमला लोगों
की ज़ुबान पर रखा ही रहता है — 'मेघे माघे गतं वय:', अर्थात्
मेघदूतम् और माघ के काव्य को पढ़ने में सारी उम्र ही बीत गई !
तो चलो, महाकवि माघ के एक समभावी श्लोक से मेघदूतम् के
आज प्रस्तुत श्लोक की तुलना करते हैं —
अनुनयौ विविधोपलकुण्डलद्युतिवितानकसंवलितांशुकम् ।
धृतधनुर्वलयस्य पयोमुच: शबलिमा बलिमानमुषो वपु: ॥
( माघ-कृत 'शिशुपालवधम्' ६/२७ )
माघ का यह श्लोक इस महाकाव्य में षड्ऋतु-वर्णन से है । इसमें
वर्षाकाल में इन्द्रधनुषी मेघ का चित्रण है । एक तो यह चित्रण
कालिदास ( मेघदूतम् ) के यहाँ प्रस्तुत श्लोक की फूहड़ जूठन
जैसा ही प्रतीत हो रहा है, दूसरे माघ ने इसे भाषा की दुरूहता
और अपने यमक अलंकार-प्रेम के दुर्भार्य बोझ से और क्लिष्ट बना
दिया है । इसे समझने के लिए इस श्लोक के निम्नांकित अर्थ पर
ग़ौर फ़रमाएँ —
" इन्द्रधनुष्-युक्त मेघ की विचित्रता ने अनेक मणियों से युक्त
कुण्डलों की कान्ति के समूह से मिश्रित छवि वाले तथा
दैत्यराज बलि को नष्ट करने वाले भगवान् वामन के शरीर का
अनुकरण किया ।"
एक तो सादृश्य-विधान ही निष्प्राण है, ऊपर से 'शबलिमा
बलिमानमुषो' में 'बलिमा' पद को अपने यमक-प्रेम के वशीभूत
होकर दो बार घुसेड़ना — इसे माघ की चातुरी समझें या
विवेकहीनता ! अलंकार-प्रेम की धुन में भाषा की सहजता और
लालित्य, न जाने, कहाँ उड़न-छू हो गये हैं ।
अब कालिदास के यहाँ प्रस्तुत श्लोक और मेरे द्वारा किये गये
उसके भावानुवाद पर ज़रा दृष्टिपात करें । वर्षा के आगमन पर
आकाश मेघाच्छन्न हो गया है । जंगल में दीमक की बाँभी के
ठीक ऊपर क्षितिज पर सप्तवर्णी इन्द्रधनुष् दिखाई पड़ता है ।
श्याम मेघों के बीच इन्द्रधनुष् की छवि ऐसी लग रही है जैसे
सामने मोरमुकुटधारी गोपाल कृष्ण खड़े हों । मोर-पिच्छ में
विविध चमकीले रंगों की छटा से सब परिचित हैं ही । श्याम
मेघों की कान्ति कृष्ण के श्याम शरीर से पूरा साम्य रखती है ।
इसे कहते हैं सम्पूर्ण सादृश्य । इसके सामने माघ की उपर्युक्त उपमा
लँगड़ी प्रतीत हो रही है । कहा जाता है कि माघ में
कालिदास का उपमा-कौशल, भारवि का अर्थ-गाम्भीर्य और
दण्डी का पद-लालित्य — तीनों एक साथ उपलब्ध होते हैं । पर
उपमा-कौशल तो माघ का आपने देख ही लिया, बाक़ी की
चर्चा हम तब करेंगे जब भारवि और दण्डी का ज़िक्र होगा ।
फ़िलहाल हम यहाँ मल्लिनाथ जी के उपरोक्त कथन पर यही
कहना चाहेंगे कि मेघदूत को पढ़ते हुए सारी उम्र ही बीत सकती है
पर पाठक उसके रस से कभी नहीं अघाता, चाहे कितनी ही बार
मेघदूत को पढ़ जाए । लेकिन माघ की जटिलता को समझने में तो
सारी उम्र ही बीत जाएगी पर माघ समझ में ही नहीं आएँगे ! 'मेघे
माघे गतं वय:' — दोनों के लिए ही उम्र कम पड़ जाती है, एक का
तो बस रसपान करने के लिए और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ
समझन-भर के लिए !
मेघदूतम् १-१५
रत्नच्छायाव्यतिकर इव प्रेक्ष्यमेतत्पुरस्तात्
वल्मीकाग्रात्प्रभवति धनु:खण्डमाखणडलस्य ।
येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापस्यते ते
बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णो: ॥
भावानुवाद
आखण्डल का चाप-खण्ड यह, विविध मणिप्रभा से रञ्जित,
दीख रहा सम्मुख बाँभी की चोटी पर होकर मण्डित ;
गोप-वेष-धारी हरि की ज्यों मोर-पिच्छ से कान्ति अनूप,
उसी विमल छवि को पाएगा, तात, तुम्हारा श्यामल रूप ॥
साभार :--
— राम मोहन 'देववाणी संस्कृत'

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