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03 October 2015

मेघदूत में विरह-चित्रण-२

मेघदूत में विरह-चित्रण-२
( शब्द-शक्ति के सन्दर्भ में )
निर्जीव शब्द-समूहों को जो चैतन्य शक्ति स्फुरित कर जीवन्त
बना देती है, वह शब्द-शक्ति कहलाती है । शब्द-शक्ति सामान्य
और साधारण-से दिखने वाले शब्द-समूहों को जीवन्त और ऊर्जा-
पुञ्ज बना देती है और उनमें अर्थगत विविधता भर देती है । एक ही
प्रकार के शब्द-समूह से खेलता हुआ कवि-रूपी कलाकार उसमें
अपनी मनोगत चेतना फूँक कर विभिन्न अर्थों और भावों की
सृष्टि करता रहता है । चूँकि शब्द-शक्ति रूपी इस अद्भुत ऊर्जा
का संचार कवि-मन से होता है और जैसा कि विधाता निर्जीव
शरीरों को चेतना से भर कर उन्हें प्राणवान बनाते हैं और एक-से
हाड़-माँस से बने पुतलों में भी अपने रचना-कौशल से वैविध्य भर
देते हैं, वैसे ही शब्द-शक्ति से संचालित कवि का सृजन-कर्म है ।
कदाचित् इसीलिए कवि धरती पर विधाता की प्रतिकृति
कहा जाता है — कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू । वह निष्प्राण
शब्दाक्षरों में प्राण संचार करता है और विविध रंगों वाली
मनोमय सृष्टि की रचना करता है ।
हम बोलचाल की भाषा में भी शब्द-शक्तियों का सुन्दर प्रयोग
करते रहते हैं । काव्यशास्त्रियों ने शब्द-शक्ति के तीन रूप बताये हैं
— अभिधा, जैसा शब्द ने 'धारण' कर रखा है, वैसा ही सीधा-
सपाट बिना लाग-लपेट वाला अर्थ जिस शब्द-शक्ति के कारण
सम्प्रेषित होता है, वह अभि+'धा' कहलाती है, लक्षणा, जिसके
द्वारा अर्थ शब्दों में निहित परिलक्षित लक्षणों से प्रकट
होता है, वह लक्षणा है, और व्यञ्जना, जो न तो शब्दों के सीधे
अर्थ का सहारा लेती है और न ही उन शब्दों से अभिलक्षित
( इंगित ) होने वाले अर्थ को ग्रहण कराती है, अपितु शब्द की
आत्मा में से ही शब्दाशय का सम्प्रेषण कराती है और शब्दार्थ
को वाणी या मुख-मुद्राओं की अपेक्षा मन से ही ग्रहण करने
की ताक़त देती है और जिसके कारण शब्द में अन्तर्निहित भाव
पाठक के मन में गूँज उठता है, अभिव्यञ्जित हो जाता है, वही
व्यञ्जना शक्ति है । हमारे देश में एक प्रान्त है हरियाणा जिसमें
और उसके पास-पड़ौस के इलाक़े में आम आदमी भी बात-बात में
व्यञ्जना शब्द-शक्ति का प्रयोग करता है । हिन्दी के सुप्रसिद्ध
हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने इस शब्द-शक्ति के आधार पर ही
अपना समस्त काव्य-संसार रच डाला है । मैं जब बागपत में तैनात
था तब मैं वहाँ के सुसभ्य नागरिकों को अक्सर कहा करता था —
आओ, कविवर ! वे चौंकते थे और मैं उन्हें समझाता था कि तुम तो
सभी लोग जन्मजात कवि ही हो । व्यञ्जना के प्रयोग से
भाषाएँ जीवन्त हो उठती हैं । व्यञ्जना की ताक़त मुर्दे में भी
प्राण फूँक देती है ! इस सृष्टि का सबसे प्रबुद्ध प्राणी इन्सान है
और इन्सानों में भी सबसे प्रबुद्ध कवि, कारण वह व्यञ्जना शब्द-
शक्ति के हाथों अपना रचना-संसार सजाता है । हमारे शरीर में
सबसे बलवान मन है और कवि व्यञ्जना के प्रयोग से इसी मन को
काबू में करने का यत्न करता है । जिस बात को कहने में कई वाक्य
लिखने पड़ते हैं, व्यञ्जना उसे कुछ ही शब्दों में सम्प्रेषित करा
जाती है और सुनने वाले को मन्त्रमुग्ध और वशीभूत होने पर विवश
कर देती है । जिस कवि ने इस शब्द-शक्ति का जितना अधिक
कुशलता से उपयोग किया, वह उतना ही महान् होता गया ।
व्यञ्जना काव्य की प्राण-शक्ति ही है ।
कालिदास का सम्पूर्ण रचना-कौशल ही इसी शब्द-शक्ति का
किया हुआ शृंगार है । कालिदास शब्दों को उनकी आत्मा के
भीतर से ध्वनित कराते हैं । कालिदास के शब्द बाहरी जगत् में
घण्टा-नाद नहीं करते अपितु वे मन को ही लम्बे वक़्त तक
गुञ्जायमान कर जाते हैं । बाहरी ध्वनियाँ और प्रतिध्वनियाँ
पल-दो-पल की ही मेहमान होती हैं, लेकिन मनोमय जगत् को
गुंजित करने वाली ध्वनि अपना दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ती है
। मन की गूँज मस्तिष्क के साथ-साथ हृदय को भी गुंजित कर
जाती है और उससे जो सकरुण मर्मभेदी रसधार स्रवित होती है,
वही तो कवि-कर्म का स्तुत्य प्रसाद है । कालिदास इस कला में
सिद्धहस्त हैं क्योंकि वे व्यञ्जना के प्रयोग के धुरन्धर कविरत्न हैं

पिछली प्रस्तुति में मैंने कालिदास के 'मेघदूतम्' से विरहिणी
यक्षिणी का एक लक्षणा-मण्डित शब्द-चित्र प्रस्तुत किया
था जिसमें कवि की वर्णन-चातुरी आपने देखी ही है । आज हम
देखेंगे कि अपनी प्रिय शब्द-शक्ति व्यञ्जना के हाथों वे उसी
विरहिणी का कितना भव्य चित्रांकन करते हैं । प्रस्तुत श्लोक
को उसके पद्यमय भावानुवाद के साथ हृदय में उतारिये और अपनी
सहृदयता से कालिदास की आत्मा को उपकृत कीजिए, प्रिय
अनन्य सुहृज्जन !
मेघदूतम् २-३०
पादान्निन्दोरमृतशिशिरान् जालमार्गप्रविष्टान्
पूर्वप्रीत्या गतमभिमुखं सन्निवृत्तं तथैव ।
चक्षु: खेदात्सलिलगुरुभि: पक्ष्मभिश्छादयन्तीं
साभ्रेऽह्नीव स्थलकमलिनीं न प्रबुद्धां न सुप्ताम् ॥
भावानुवाद
खिड़की से आती चन्दा की
मधुर सुधा-सी शीत किरण,
देखा होगा प्रेम-विवश, फिर
फेरे होंगे दुखी नयन,
पलक बन्द फिर किये अश्रु-भर,
जगी न सोई होगी, तात !
खिली न हो, अनखिली न भी हो,
मेघ-भरे दिन ज्यों जलजात ।
— राम मोहन 'देववाणी संस्कृत'
पूर्व दिशा में अपनी षोडश कलाओं सहित कलानिधि ( चन्द्र
देव ) आकाश में उग आये हैं । विरहिणी नायिका के भवन की
खिड़की उसी दिशा में है । चन्द्रमा का सौन्दर्य किसे नही
लुभा लेता और फिर उसमें तो उसे अपने बिछुड़े प्रियतम के सुन्दर
मुखड़े की छवि भी दीख पड़ी है । सुन्दर चन्द्रमा प्रिय की याद
दिला ही देता है । पर जिस पल इस सौन्दर्य पर ध्यान जाता है
और मन उसकी आनन्दानुभति को अनुभव करता ही है, उसी पल
प्रियतम का वियोग भी स्मरण हो आता है जो दिल में छुरी
भोंक देता है । वियोग-पीड़ा का साक्षात्कार असहनीय हो
उठता है और वियोगिनी उधर से ( चन्द्र की तरफ़ से ) अपने नयन
फेर लेती है । आँसुओं की धार उसके सुन्दर मुखड़े का श्रीहरण कर
लेती है । चन्द्रमा एक ओर प्रियतम के मुखड़े का सादृश्य उपस्थित
करके आनन्दित करता है, पर उसी पल दूसरी ओर प्रिय के बिछुड़े
होने की पीड़ा हृदय से नेत्रों में भी उतर आती है । उस रात नींद
कैसे आये, बार-बार प्रिय का स्मरण करते रहने को मन विवश जो
कर देता है, लेकिन वियोग-दु:ख की असहनीयता में वियोगिन
चाहती है कि उसे नींद आ जाए और वह दु:ख भूल जाए । इसी
उधेड़बुन मे विरहिणी रात-भर न ठीक से सो ही पाती है और न
ठीक से जाग ही पाती है । मेघाच्छन्न दिवस में कमलिनी की
जो दशा होती है, उसकी एक गतिशील सम्पूर्ण उपमा देकर
कालिदास न सुन्दर प्रस्तुति को सुन्दर से सुन्दरतम बना डाला
है ! इस दृश्य को देखकर या सुनकर कोई भी भावुक सहृदय रोये
बिना नहीं रह सकता ! वियोगगत विवशता का इससे सुन्दर
रूपांकन हो ही नहीं सकता । यहाँ रचना के शब्द न तो प्रियतम के
वियोग की स्मृति का उल्लेख कर रहे हैं और न वियोगिनी के
चन्द्रमा की ओर से मुख फेर लेने का कारण ही सुस्पष्ट रूप से लिखे
हैं, पर भाव तो तीर की तरह पाठकों के दिल को चीर ही गया है
। बिन कहे भी सब कुछ कह डाला, यही तो है व्यञ्जना शब्द-
शक्ति का चमत्कार ! इसकी ताक़त का अन्दाज इसी से
लगाया जा सकता है कि सहृदय पाठक को यह शब्द-चित्र रात-
भर रोते रहने पर विवश कर सकता है । कालिदास इसीलिए
पाठकों के हृदय पर राज करते हैं और इसीलिए आज भी उन जैसी
प्रतिभा का धनी कोई और नहीं हुआ है । हमारा महाकवि के
चरणों में शत-शत नमन !

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