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03 October 2015

मेघदूत में विरह-चित्रण

. मेघदूत में विरह-चित्रण
( शब्द-शक्ति के सन्दर्भ में )
विरह हृदयगत भाव है । विरह का चित्रण करने में कालिदास ने
अधिकतर भाषा की व्यञ्जना शक्ति का सहारा लिया है ।
कालिदास मूलत: व्यञ्जना के ही कवि हैं । व्यञ्जना शब्दों के
भीतर से काव्य की आत्मा को प्रकट कर देती है और पाठक को
उस भावदशा में सहजता से ले चलती है जहाँ वह कवि के अन्त:करण
के समक्ष स्वयं को खड़ा पाता है । व्यञ्जना के माध्यम से कवि-
मन से सीधा साक्षात्कार होता है । इस प्रकार व्यञ्जना
काव्य के साधारणीकरण की मुख्य संवाहिका ऊर्जा है । वह
कविता की सम्प्रेषणीयता बढ़ा देती है । लेकिन महाकवि ने
यत्र-तत्र लक्षणा शक्ति का भी सहारा लिया है । लक्षणा
शक्ति कविता में ऐसे ही है जैसे कोई नटी अपने वस्त्र-भूषा और
शृंगार आदि के माध्यम से अपने हृदयगत भावों को व्यक्त कर रही
हो जबकि व्यञ्जना शक्ति ऐसे है जैसे मानों वही नटी बिना
वस्त्राभूषण की अपेक्षा किये ही केवल अपनी मुख-मुद्राओं और
हावभावों से ही हृदयगत भावों को सम्प्रेषित करती हो ।
यहाँ प्रस्तुत 'मेघदूतम्' का श्लोक कालिदास द्वारा लक्षणा
शक्ति के प्रयोग का सुन्दर उदाहरण है ।
मेघदूतम् २-३१
नि:श्वासेनाधरकिसलयक्लेशिना विक्षिपन्तीं
शुद्धस्नानात्परुषमलकं नूनमागण्डलम्बम् ।
मत्सम्भोग: कथमुपनमेत्स्वप्नजोऽपीति निद्रां
आकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥
भावानुवाद
आकपोल-लम्बित कच रूखे
जल-मज्जन से हुए कठोर,
अधर-पल्लवों को झुलसाती
आह जिन्हें देती झकझोर,
चाह रही, पर नींद न आती,
बाधित करती दृगजल-धार,
काश, मिलन हो सके स्वप्न में
ही मुझसे, कर रही विचार ।

साभार :--
 राम मोहन 'देववाणी संस्कृत'

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