ॐ श्री गुरुभ्यो नमः|| गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर: | गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ||

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09 October 2015

बुद्धचरितम्

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बुद्धचरितम् (Buddhacharitam) अश्वघोषस्य प्रसिद्धं महाकाव्यम् अस्ति । अस्मिन् महाकाव्ये सप्तदश सर्गाः उपलभ्यन्ते। अयं ग्रन्थः बहुशः त्रिसहस्रश्लोकपरिमितः आसीदिति चीनादेशीयस्य प्रो.तककुसुमहाशयस्य भणितिरस्ति । किन्तु अधुना लभ्यमाने अस्मिन् काव्ये केवलम् १३६८ श्लोकाः सन्ति । किन्तु सप्तमेऽष्टमे वा शतके चीनाभाषया भाषान्तरिते, तिबतीयभाषया भाषान्तरिते बुद्धचरिते च २८ सर्गाः भवन्ति । एतेन ज्ञायते यत्, संस्कृतभाषायां "बुद्धचरितस्य" भागमात्रं लब्धम् इति ।
राजा शुद्धोदनः कपिलवस्तुनाम्नि नगरे राज्यभारं कुर्वन्नासीत् । तस्य पुत्रः सिद्धार्थः । सिद्धार्थः युवराजः । एतस्य समृद्धम् राज्यम्, प्रवृद्धः अधिकारः, सौन्दर्यवती प्रिया च भार्या यशोधरा । स्वर्गसमानं सुखमयम् जीवनं सिद्धार्थस्य आसीत् । तथापि सः वैराग्यमापन्नः कथम्? इति "बुद्धचरिते" वर्णितं कविना । तत्र महात्मनः बुद्धस्य सर्वांगीणचरितं निबद्धमस्ति। यथा-अभिनिष्क्रमणं, तपोवनगमनं, यशोधराविलापः, मगधयात्रावर्णनम्, सिद्धार्थस्य बुद्दत्वप्रापणम्, धर्मप्रचारः, शिक्षाप्रसारः इत्यादयः विषयाः सरलया भावपरिपूर्णया हृद्यावर्जकशैल्या वर्णिताः।अस्मिन् काव्ये बौद्धमतस्य पारिभाषिकाः शब्दाः यथेष्ठं विद्यन्ते । अश्वघोषः बौद्धमतस्य महायानपरम्परायाः प्रवर्तक आसीदिति बुद्धचरितादवगम्यते ।

वैराग्यस्य निमित्तम् :---
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बुद्धस्य वैराग्यप्राप्तौ किं कारणम्? इति प्रश्ने, राजकुमारः प्रथमे विहारसमये वृद्धं मार्गचारिणं दृष्ट्वा सूतं पृच्छति, यथात्र श्रुणुमो वयं कविवाणीम् एवम्-
क एष भोः सूत! नरोऽभ्युपेतः ? केशैः सितैर्यष्टिविषक्तहस्तः ।
भ्रूसंवृताक्षः शिथिलानताङ्गः , किं विक्रियैषा प्रकृतिर्यदृच्छा ॥ बुद्धच. ३-२८
अस्य सूतेन समुचितम् उत्तरम् दत्तम्, यथा-

रूपस्य हन्त्री व्यसनं बलस्य, शोकस्य योनिर्निधनं रतीनाम् ।
नाशः स्मृतीनां रिपुरिन्द्रियाणाम् एषा जरा नाम ययैष भग्नः ॥ बुद्धच. ३-३०
अपि च-

पीतं ह्यनेनापि पयः शिशुत्वे, कालेन भूयः परिमृष्टमुर्व्याम् ।
क्रमेण भूत्वा च युवा वपुष्मान्, क्रमेण तेनैव जरामुपेतः ॥ बुद्धच. ३-३१
यदा द्वितीयवारं सः विहारयात्रार्थं बहिर्गच्छति, तदा त एव देवाः रोगिणम् मनुष्यम् ससृजुः । तं दृष्ट्वा गौतमः सूतं पृच्छति यथा -

स्थूलोदरः श्वासचलच्छरीरः स्रस्तांसबाहुः कृशपाण्डुगात्रः ।
अम्बेति वाचं करुणं ब्रुवाणः परं समाश्लिष्य नरः क एषः? ॥
ततः सूतः तं वदति, " रोगाभिधानः सुमहाननर्थः" इति । तृतीयवारम् विहारयात्रासमये देवाः एकं गतश्वासं मनुष्यं ससृजुः । तम् अवलोक्य कुमारः " नरैश्चतुर्भिः ह्रियते क एषः? इति पृच्छति । तदा सूतः वदति यत्-

बुद्धीन्द्रियप्राणगुणैर्वियुक्तः सुप्तो विसंज्ञः तृणकाष्ठभूतः ।
संवर्ध्य संरक्ष्य च यत्नवद्भिः प्रियाप्रियैस्त्यज्यत एष कोऽपि । इति । एतच्छ्रुत्वा शौद्धोदनिः संविग्नमानसः भवति।
एवम् त्रिवारं राजकुमारस्य यात्रासमये शुद्धान्तवासिनो देवाः मायं ससृजुः । तदनुगुणं मार्गे युवराजः क्रमेण वृद्धं, रोगिणं, मृतं च पश्यति, पृच्छति च सूतम् । राज्ञा आदिष्टोऽपि सूतः अवाच्यमप्यर्थम् देवमायया मुग्धः जगतः सर्वां दुःखवार्तां विवृणोति । तेन कुमारः सिद्धार्थः संविग्नमानसः बभूव ।

अनुवाद-: :----
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बुद्धचरितस्य चीनीभाषायामनुवादः 420तमे ख्रीष्टाब्दे धर्मरक्षमहोदयेन कृतम्। अयं चीनीभाषानुवादः सैम्युअल बील महोदयेन आंग्लभाषायाम् अनुदितः। तिब्बतीभाषामाश्रित्य यः अनुवादः उपलभ्यते सः अपि जान्स्टन महोदयेन आंग्लभाषायां अनूदितः। 1940 तमे ख्रीष्टाब्दे अस्य पाठस्य हिन्दीभाषायामपि अनुवादः सूर्यनारायणचौधरिमहाभागेन कृतः। मया च भवनाथेन झोपाख्येन पुनः अनुपलब्धस्य अंशस्य संस्कृतभाषायाम् पद्यानुवादः अश्वघोषस्य काव्यरीतिमवलम्ब्य कृतः इति। अस्य पञ्चदशे सर्गे भगवान् बुद्ध धर्मस्यावश्यकतां प्रतिपादयतिः-

 मया प्रतिज्ञातमिमं हि लोकं निभाल्य दुःखार्णववीचिमग्नम्।
 सन्तारयिष्यामि तटं प्रयातः मुक्तान् विधास्यामि जनान् प्रमुक्तः।।7।।

प्राप्य श्रियं स्वार्थपरो जगत्यां जनो विजिह्रेति सदानुरक्तः।
 उन्मीलिताक्षस्तु धनं विशिष्टं लब्ध्वा वितार्यं हि जनेषु वेत्ति।।8।।

दृढस्थलस्थो यदि पूरवाहितं कुष्णाति नद्या न हि नास्ति शूरः।
 अवाप्तसम्पत्तिरथो दरिद्रान् न विभृयाच्चेन्न हि सोस्ति शूरः।।9।।

स्वस्थैर्यथा व्याधियुतो मनुष्यः चिकित्सितव्यः सुलभोपचारैः।
 सन्मार्गयातश्च तथैव योजयेद् गम्येन मार्गेण कुमार्गिणो जनान्।।10।।

03 October 2015

उपमा कालिदासस्य

उपमा कालिदासस्य
'उपमा कालिदासस्य' का अभिप्राय यह नहीं है कि किसी
अन्य कवि ने सादृश्यमूलक अलंकारों से अपनी कविता को
अलंकृत नहीं किया है । फिर कालिदास के लिए यह क्यों ?
कालिदास इस क्षेत्र में अनूठे जो हैं ! आइए, इसे समझने के लिए
संगत विषय पर कुछ परोक्ष चिन्तन कर लिया जाय ।
एक व्यक्ति एक फूलदार पौधे का रोपण करने के लिए पहले बहुत
अच्छी तरह मिट्टी तैयार करता है । फिर हल्की-सी सिंचाई
करके उसमें उस पौधे के बीजों को बोता है, फिर धूप और पानी
का निरन्तर ख़याल रखता है और आवश्यकतानुसार ही देशी खाद
भी डालता है । जब बीजांकुर धरती का पेट चीर कर झाँकने लगते
हैं तब वह उसकी लगातार सावधानी से देखभाल करता है ताकि
सही समय आने पर उसमें सुन्दर फूल खिल सकें । और, वह पल आता है
जब परिश्रम सार्थक होता है और सुगन्धित फूल खिलकर सारे
परिवेश को सुरम्य और सुरभित कर देते हैं । इन सुशोभन फूलों पर
अनेकों जीव अपनी जान छिड़कते हैं और उन पर अपना हार्दिक
उल्लास निछावर करते हैं । इसका सुपरिणाम यह होता है कि यह
सुन्दर पुष्पावली रसीले मधुर फलों के गुच्छों में रूपान्तरित हो
जाती है ।
एक दूसरा व्यक्ति इसे देखता है और वह पेड़ ही बाज़ार से ख़रीद
लाता है । सही देखभाल के अभाव में इस पेड़ पर या तो फूल आते
ही नहीं या बहुत ही छोटे अल्पविकसित अनाकर्षक फूल आते हैं ।
उसे पहले वाले व्यक्ति से ईर्ष्या होती है और वह बाज़ार से कुछ
फूल और फल ख़रीद कर लाता है तथा दर्शकों से छिपाकर उन्हें
पेड़ पर यत्र-तत्र लटका देता है । पर बाज़ार से ख़रीदे हुए फूल और
फल वह प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाते और शीघ्र ही उसकी पोल
खुल जाती है ।
एक तीसरा व्यक्ति तो इन सबका बाप निकला । वह नक़ली पेड़
ही घर पर ले आया और उसमें नक़ली फूल और नक़ली फल लटका
दिये ।
यही अन्तर है कालिदास के अलंकार-विधान में और अन्य कवियों
की अलंकार-योजना में । कालिदास को अलंकारों का कोई
लोभ-लालच नहीं, उनकी कविता तो सहज लावण्यवती है ।
किसी रूपवती स्त्री को आभूषणों से सज्जित होने की उतनी
ललक नहीं होती जितनी कि कुरूपा को होती है । वह दिन-भर
रूप-सिंगार करने में, न जाने, कितने प्रकार के यत्न करती रहती है
पर सहज रूप-सौन्दर्य के आकर्षण को कभी पा नहीं पाती ।
कालिदास के काव्य की भूमि ही अलंकारों के लिए उर्वरा है ।
वे काव्य-सृजन के मामले में सच्चे निष्काम कर्मयोगी हैं और फल
की क़तई चिन्ता नहीं करते । वह नहीं सोचते कि अलंकार सजाने
हैं इसलिए ऐसी भूमिका बनाएँ कि अलंकार सजाने का अवसर
बन जाए, अपितु वे तो काव्य की सम्प्रेषणीयता पर ही ज़्यादा
केन्द्रित रहते हैं । पाठक कहीं बिदक न जाए, कहीं उनकी
कविता बोझिल न हो जाए और पाठक पढ़ने से ही विमुख न हो
जाए, इसी पर सतत ध्यान रखते हैं कालिदास । अलंकारों के
नाहक बोझ से कविता की गतिशीलता ही ख़त्म हो जाती है ।
इसके लिए सहजता ही ज़्यादा ज़रूरी होती है, न कि अलंकार ।
जैसे सम्पूर्ण तैयारी के साथ पेड़ उगाने वाले माली को सुन्दर-
सुगन्धित फूलों और सुमधुर फलों का उपहार मिलना तय है, वह
फूलों के लिए उतना चिन्तित नहीं रहता जितना कि पेड़ के
स्वास्थ्य के प्रति होता है, वैसे ही सहज-सहज स्वाभाविक
रीति से किये गये कालिदास के काव्य में अलंकारों के साथ
पाठक की सुरुचि की निरन्तरता के फूल अवश्य खिलते ही हैं ।
जैसे सिंचित उपजाऊ भूमि में वन-सम्पदा बिना प्रयास के उग
आती है, वैसे ही कालिदास को अलंकारों के लिए अलग से श्रम
करना नहीं पड़ता है, अलंकार तो उनके काव्य की उपजाऊ
मिट्टी में अपना सौन्दर्य बिखरने के लिए सदैव उतावले रहते ही हैं
। सहजता ही काव्य-सौन्दर्य की जननी है, पर कलाबाजियों के
शौक़ीन अन्य कवियों को यह बात समझ ही नहीं आई और वे
सम्प्रेषण को छोड़कर व्यर्थ ही कविता को अलंकारों के नक़ली
सौन्दर्य से अपने काव्य को अलंकृत करने में जुट गये फलत: लाख
कलाबाज़ी करके भी वे कालिदास की बराबरी नहीं पा सके ।
अरे, बराबरी तो दूर, पास खड़े होने की भी ज़ुर्रत उनमें नहीं हैं ! मैंने
एक दिन पहले भी कहा था कि कालिदास को अपने प्रिय
पाठकों का बहुत ख़याल है और यही एक तत्त्व है जो उनकी
सर्वोच्चता का झण्डा कभी झुकने नहीं देता है । पदे-पदे
लालित्यं की जगह पदे-पदे सहजता कालिदास के काव्य का मूल
प्राण है । सहजता है तो लालित्य तो आएगा ही ! हिन्दी के
छात्र जानते हैं कि इसी सहजता के कारण मुंशी प्रेमचन्द कथा-
सम्राट् कहे जाते हैं ।
सहजता कोई बाहर से थोपी जाने वाली वस्तु नहीं है । वह तो
हमारा सबका स्वभाव है, वह हमारे साथ ही जन्मा है — सह + ज
= सहज, साथ जन्मा । जो हमारे स्वभाव का हिस्सा ही है, वह
हमें चाहे जहाँ दिखे या न दिखे, पर हमें आसानी से अंगीकृत हो
ही जाता है, सुगमता से स्वीकार्य हो ही जाता है । ट्रेन में एक
अजनबी भी हमारा अपना बन जाता है और हमारा मन जीत
लेता है, इसी सहजता के कारण । सहज कृत्य को समझने में हमारे
मन को कोई कसरत करनी नहीं पड़ती, वह तो ऐसे ही वहाँ
फिसलने लगता है जैसे गीले शीशे पर पैर फिसलता है । कालिदास
सृजन के समय पाठक-मन की इसी सहजता पर केन्द्रित रहते हैं और
जब देखते हैं कि वह काव्य-रस से सराबोर है, अलंकारों को ऐसे ही
धीरे-से उसमें खिसका देते हैं जैसे कोई शक्कर की चाशनी
( syrup ) में सुगन्ध की कुछ बूँदें टपका दे तो उसकी मधुरता सुरभित
भी हो जाती है और रसपान करने वाले के आनन्दातिरेक को
बढ़ा देती है । बाक़ी कवियों का हाल मत पूछो, वे करेले का रस
तैयार करते हैं और उसमें सुगन्ध डालने की कुचेष्टा करते हैं !
अलंकारों से उनकी कड़वी कविता और भी ज़्यादा त्याज्य हो
जाती है !
अक्सर कालिदास के 'मेघदूतम्' और महाकवि माघ के काव्य के
विषय में प्रसिद्ध टीकाकार मल्लिनाथ का यह जुमला लोगों
की ज़ुबान पर रखा ही रहता है — 'मेघे माघे गतं वय:', अर्थात्
मेघदूतम् और माघ के काव्य को पढ़ने में सारी उम्र ही बीत गई !
तो चलो, महाकवि माघ के एक समभावी श्लोक से मेघदूतम् के
आज प्रस्तुत श्लोक की तुलना करते हैं —
अनुनयौ विविधोपलकुण्डलद्युतिवितानकसंवलितांशुकम् ।
धृतधनुर्वलयस्य पयोमुच: शबलिमा बलिमानमुषो वपु: ॥
( माघ-कृत 'शिशुपालवधम्' ६/२७ )
माघ का यह श्लोक इस महाकाव्य में षड्ऋतु-वर्णन से है । इसमें
वर्षाकाल में इन्द्रधनुषी मेघ का चित्रण है । एक तो यह चित्रण
कालिदास ( मेघदूतम् ) के यहाँ प्रस्तुत श्लोक की फूहड़ जूठन
जैसा ही प्रतीत हो रहा है, दूसरे माघ ने इसे भाषा की दुरूहता
और अपने यमक अलंकार-प्रेम के दुर्भार्य बोझ से और क्लिष्ट बना
दिया है । इसे समझने के लिए इस श्लोक के निम्नांकित अर्थ पर
ग़ौर फ़रमाएँ —
" इन्द्रधनुष्-युक्त मेघ की विचित्रता ने अनेक मणियों से युक्त
कुण्डलों की कान्ति के समूह से मिश्रित छवि वाले तथा
दैत्यराज बलि को नष्ट करने वाले भगवान् वामन के शरीर का
अनुकरण किया ।"
एक तो सादृश्य-विधान ही निष्प्राण है, ऊपर से 'शबलिमा
बलिमानमुषो' में 'बलिमा' पद को अपने यमक-प्रेम के वशीभूत
होकर दो बार घुसेड़ना — इसे माघ की चातुरी समझें या
विवेकहीनता ! अलंकार-प्रेम की धुन में भाषा की सहजता और
लालित्य, न जाने, कहाँ उड़न-छू हो गये हैं ।
अब कालिदास के यहाँ प्रस्तुत श्लोक और मेरे द्वारा किये गये
उसके भावानुवाद पर ज़रा दृष्टिपात करें । वर्षा के आगमन पर
आकाश मेघाच्छन्न हो गया है । जंगल में दीमक की बाँभी के
ठीक ऊपर क्षितिज पर सप्तवर्णी इन्द्रधनुष् दिखाई पड़ता है ।
श्याम मेघों के बीच इन्द्रधनुष् की छवि ऐसी लग रही है जैसे
सामने मोरमुकुटधारी गोपाल कृष्ण खड़े हों । मोर-पिच्छ में
विविध चमकीले रंगों की छटा से सब परिचित हैं ही । श्याम
मेघों की कान्ति कृष्ण के श्याम शरीर से पूरा साम्य रखती है ।
इसे कहते हैं सम्पूर्ण सादृश्य । इसके सामने माघ की उपर्युक्त उपमा
लँगड़ी प्रतीत हो रही है । कहा जाता है कि माघ में
कालिदास का उपमा-कौशल, भारवि का अर्थ-गाम्भीर्य और
दण्डी का पद-लालित्य — तीनों एक साथ उपलब्ध होते हैं । पर
उपमा-कौशल तो माघ का आपने देख ही लिया, बाक़ी की
चर्चा हम तब करेंगे जब भारवि और दण्डी का ज़िक्र होगा ।
फ़िलहाल हम यहाँ मल्लिनाथ जी के उपरोक्त कथन पर यही
कहना चाहेंगे कि मेघदूत को पढ़ते हुए सारी उम्र ही बीत सकती है
पर पाठक उसके रस से कभी नहीं अघाता, चाहे कितनी ही बार
मेघदूत को पढ़ जाए । लेकिन माघ की जटिलता को समझने में तो
सारी उम्र ही बीत जाएगी पर माघ समझ में ही नहीं आएँगे ! 'मेघे
माघे गतं वय:' — दोनों के लिए ही उम्र कम पड़ जाती है, एक का
तो बस रसपान करने के लिए और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ
समझन-भर के लिए !
मेघदूतम् १-१५
रत्नच्छायाव्यतिकर इव प्रेक्ष्यमेतत्पुरस्तात्
वल्मीकाग्रात्प्रभवति धनु:खण्डमाखणडलस्य ।
येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापस्यते ते
बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णो: ॥
भावानुवाद
आखण्डल का चाप-खण्ड यह, विविध मणिप्रभा से रञ्जित,
दीख रहा सम्मुख बाँभी की चोटी पर होकर मण्डित ;
गोप-वेष-धारी हरि की ज्यों मोर-पिच्छ से कान्ति अनूप,
उसी विमल छवि को पाएगा, तात, तुम्हारा श्यामल रूप ॥
साभार :--
— राम मोहन 'देववाणी संस्कृत'

मेघदूत में विरह-चित्रण-२

मेघदूत में विरह-चित्रण-२
( शब्द-शक्ति के सन्दर्भ में )
निर्जीव शब्द-समूहों को जो चैतन्य शक्ति स्फुरित कर जीवन्त
बना देती है, वह शब्द-शक्ति कहलाती है । शब्द-शक्ति सामान्य
और साधारण-से दिखने वाले शब्द-समूहों को जीवन्त और ऊर्जा-
पुञ्ज बना देती है और उनमें अर्थगत विविधता भर देती है । एक ही
प्रकार के शब्द-समूह से खेलता हुआ कवि-रूपी कलाकार उसमें
अपनी मनोगत चेतना फूँक कर विभिन्न अर्थों और भावों की
सृष्टि करता रहता है । चूँकि शब्द-शक्ति रूपी इस अद्भुत ऊर्जा
का संचार कवि-मन से होता है और जैसा कि विधाता निर्जीव
शरीरों को चेतना से भर कर उन्हें प्राणवान बनाते हैं और एक-से
हाड़-माँस से बने पुतलों में भी अपने रचना-कौशल से वैविध्य भर
देते हैं, वैसे ही शब्द-शक्ति से संचालित कवि का सृजन-कर्म है ।
कदाचित् इसीलिए कवि धरती पर विधाता की प्रतिकृति
कहा जाता है — कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू । वह निष्प्राण
शब्दाक्षरों में प्राण संचार करता है और विविध रंगों वाली
मनोमय सृष्टि की रचना करता है ।
हम बोलचाल की भाषा में भी शब्द-शक्तियों का सुन्दर प्रयोग
करते रहते हैं । काव्यशास्त्रियों ने शब्द-शक्ति के तीन रूप बताये हैं
— अभिधा, जैसा शब्द ने 'धारण' कर रखा है, वैसा ही सीधा-
सपाट बिना लाग-लपेट वाला अर्थ जिस शब्द-शक्ति के कारण
सम्प्रेषित होता है, वह अभि+'धा' कहलाती है, लक्षणा, जिसके
द्वारा अर्थ शब्दों में निहित परिलक्षित लक्षणों से प्रकट
होता है, वह लक्षणा है, और व्यञ्जना, जो न तो शब्दों के सीधे
अर्थ का सहारा लेती है और न ही उन शब्दों से अभिलक्षित
( इंगित ) होने वाले अर्थ को ग्रहण कराती है, अपितु शब्द की
आत्मा में से ही शब्दाशय का सम्प्रेषण कराती है और शब्दार्थ
को वाणी या मुख-मुद्राओं की अपेक्षा मन से ही ग्रहण करने
की ताक़त देती है और जिसके कारण शब्द में अन्तर्निहित भाव
पाठक के मन में गूँज उठता है, अभिव्यञ्जित हो जाता है, वही
व्यञ्जना शक्ति है । हमारे देश में एक प्रान्त है हरियाणा जिसमें
और उसके पास-पड़ौस के इलाक़े में आम आदमी भी बात-बात में
व्यञ्जना शब्द-शक्ति का प्रयोग करता है । हिन्दी के सुप्रसिद्ध
हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने इस शब्द-शक्ति के आधार पर ही
अपना समस्त काव्य-संसार रच डाला है । मैं जब बागपत में तैनात
था तब मैं वहाँ के सुसभ्य नागरिकों को अक्सर कहा करता था —
आओ, कविवर ! वे चौंकते थे और मैं उन्हें समझाता था कि तुम तो
सभी लोग जन्मजात कवि ही हो । व्यञ्जना के प्रयोग से
भाषाएँ जीवन्त हो उठती हैं । व्यञ्जना की ताक़त मुर्दे में भी
प्राण फूँक देती है ! इस सृष्टि का सबसे प्रबुद्ध प्राणी इन्सान है
और इन्सानों में भी सबसे प्रबुद्ध कवि, कारण वह व्यञ्जना शब्द-
शक्ति के हाथों अपना रचना-संसार सजाता है । हमारे शरीर में
सबसे बलवान मन है और कवि व्यञ्जना के प्रयोग से इसी मन को
काबू में करने का यत्न करता है । जिस बात को कहने में कई वाक्य
लिखने पड़ते हैं, व्यञ्जना उसे कुछ ही शब्दों में सम्प्रेषित करा
जाती है और सुनने वाले को मन्त्रमुग्ध और वशीभूत होने पर विवश
कर देती है । जिस कवि ने इस शब्द-शक्ति का जितना अधिक
कुशलता से उपयोग किया, वह उतना ही महान् होता गया ।
व्यञ्जना काव्य की प्राण-शक्ति ही है ।
कालिदास का सम्पूर्ण रचना-कौशल ही इसी शब्द-शक्ति का
किया हुआ शृंगार है । कालिदास शब्दों को उनकी आत्मा के
भीतर से ध्वनित कराते हैं । कालिदास के शब्द बाहरी जगत् में
घण्टा-नाद नहीं करते अपितु वे मन को ही लम्बे वक़्त तक
गुञ्जायमान कर जाते हैं । बाहरी ध्वनियाँ और प्रतिध्वनियाँ
पल-दो-पल की ही मेहमान होती हैं, लेकिन मनोमय जगत् को
गुंजित करने वाली ध्वनि अपना दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ती है
। मन की गूँज मस्तिष्क के साथ-साथ हृदय को भी गुंजित कर
जाती है और उससे जो सकरुण मर्मभेदी रसधार स्रवित होती है,
वही तो कवि-कर्म का स्तुत्य प्रसाद है । कालिदास इस कला में
सिद्धहस्त हैं क्योंकि वे व्यञ्जना के प्रयोग के धुरन्धर कविरत्न हैं

पिछली प्रस्तुति में मैंने कालिदास के 'मेघदूतम्' से विरहिणी
यक्षिणी का एक लक्षणा-मण्डित शब्द-चित्र प्रस्तुत किया
था जिसमें कवि की वर्णन-चातुरी आपने देखी ही है । आज हम
देखेंगे कि अपनी प्रिय शब्द-शक्ति व्यञ्जना के हाथों वे उसी
विरहिणी का कितना भव्य चित्रांकन करते हैं । प्रस्तुत श्लोक
को उसके पद्यमय भावानुवाद के साथ हृदय में उतारिये और अपनी
सहृदयता से कालिदास की आत्मा को उपकृत कीजिए, प्रिय
अनन्य सुहृज्जन !
मेघदूतम् २-३०
पादान्निन्दोरमृतशिशिरान् जालमार्गप्रविष्टान्
पूर्वप्रीत्या गतमभिमुखं सन्निवृत्तं तथैव ।
चक्षु: खेदात्सलिलगुरुभि: पक्ष्मभिश्छादयन्तीं
साभ्रेऽह्नीव स्थलकमलिनीं न प्रबुद्धां न सुप्ताम् ॥
भावानुवाद
खिड़की से आती चन्दा की
मधुर सुधा-सी शीत किरण,
देखा होगा प्रेम-विवश, फिर
फेरे होंगे दुखी नयन,
पलक बन्द फिर किये अश्रु-भर,
जगी न सोई होगी, तात !
खिली न हो, अनखिली न भी हो,
मेघ-भरे दिन ज्यों जलजात ।
— राम मोहन 'देववाणी संस्कृत'
पूर्व दिशा में अपनी षोडश कलाओं सहित कलानिधि ( चन्द्र
देव ) आकाश में उग आये हैं । विरहिणी नायिका के भवन की
खिड़की उसी दिशा में है । चन्द्रमा का सौन्दर्य किसे नही
लुभा लेता और फिर उसमें तो उसे अपने बिछुड़े प्रियतम के सुन्दर
मुखड़े की छवि भी दीख पड़ी है । सुन्दर चन्द्रमा प्रिय की याद
दिला ही देता है । पर जिस पल इस सौन्दर्य पर ध्यान जाता है
और मन उसकी आनन्दानुभति को अनुभव करता ही है, उसी पल
प्रियतम का वियोग भी स्मरण हो आता है जो दिल में छुरी
भोंक देता है । वियोग-पीड़ा का साक्षात्कार असहनीय हो
उठता है और वियोगिनी उधर से ( चन्द्र की तरफ़ से ) अपने नयन
फेर लेती है । आँसुओं की धार उसके सुन्दर मुखड़े का श्रीहरण कर
लेती है । चन्द्रमा एक ओर प्रियतम के मुखड़े का सादृश्य उपस्थित
करके आनन्दित करता है, पर उसी पल दूसरी ओर प्रिय के बिछुड़े
होने की पीड़ा हृदय से नेत्रों में भी उतर आती है । उस रात नींद
कैसे आये, बार-बार प्रिय का स्मरण करते रहने को मन विवश जो
कर देता है, लेकिन वियोग-दु:ख की असहनीयता में वियोगिन
चाहती है कि उसे नींद आ जाए और वह दु:ख भूल जाए । इसी
उधेड़बुन मे विरहिणी रात-भर न ठीक से सो ही पाती है और न
ठीक से जाग ही पाती है । मेघाच्छन्न दिवस में कमलिनी की
जो दशा होती है, उसकी एक गतिशील सम्पूर्ण उपमा देकर
कालिदास न सुन्दर प्रस्तुति को सुन्दर से सुन्दरतम बना डाला
है ! इस दृश्य को देखकर या सुनकर कोई भी भावुक सहृदय रोये
बिना नहीं रह सकता ! वियोगगत विवशता का इससे सुन्दर
रूपांकन हो ही नहीं सकता । यहाँ रचना के शब्द न तो प्रियतम के
वियोग की स्मृति का उल्लेख कर रहे हैं और न वियोगिनी के
चन्द्रमा की ओर से मुख फेर लेने का कारण ही सुस्पष्ट रूप से लिखे
हैं, पर भाव तो तीर की तरह पाठकों के दिल को चीर ही गया है
। बिन कहे भी सब कुछ कह डाला, यही तो है व्यञ्जना शब्द-
शक्ति का चमत्कार ! इसकी ताक़त का अन्दाज इसी से
लगाया जा सकता है कि सहृदय पाठक को यह शब्द-चित्र रात-
भर रोते रहने पर विवश कर सकता है । कालिदास इसीलिए
पाठकों के हृदय पर राज करते हैं और इसीलिए आज भी उन जैसी
प्रतिभा का धनी कोई और नहीं हुआ है । हमारा महाकवि के
चरणों में शत-शत नमन !

मेघदूत में विरह-चित्रण

. मेघदूत में विरह-चित्रण
( शब्द-शक्ति के सन्दर्भ में )
विरह हृदयगत भाव है । विरह का चित्रण करने में कालिदास ने
अधिकतर भाषा की व्यञ्जना शक्ति का सहारा लिया है ।
कालिदास मूलत: व्यञ्जना के ही कवि हैं । व्यञ्जना शब्दों के
भीतर से काव्य की आत्मा को प्रकट कर देती है और पाठक को
उस भावदशा में सहजता से ले चलती है जहाँ वह कवि के अन्त:करण
के समक्ष स्वयं को खड़ा पाता है । व्यञ्जना के माध्यम से कवि-
मन से सीधा साक्षात्कार होता है । इस प्रकार व्यञ्जना
काव्य के साधारणीकरण की मुख्य संवाहिका ऊर्जा है । वह
कविता की सम्प्रेषणीयता बढ़ा देती है । लेकिन महाकवि ने
यत्र-तत्र लक्षणा शक्ति का भी सहारा लिया है । लक्षणा
शक्ति कविता में ऐसे ही है जैसे कोई नटी अपने वस्त्र-भूषा और
शृंगार आदि के माध्यम से अपने हृदयगत भावों को व्यक्त कर रही
हो जबकि व्यञ्जना शक्ति ऐसे है जैसे मानों वही नटी बिना
वस्त्राभूषण की अपेक्षा किये ही केवल अपनी मुख-मुद्राओं और
हावभावों से ही हृदयगत भावों को सम्प्रेषित करती हो ।
यहाँ प्रस्तुत 'मेघदूतम्' का श्लोक कालिदास द्वारा लक्षणा
शक्ति के प्रयोग का सुन्दर उदाहरण है ।
मेघदूतम् २-३१
नि:श्वासेनाधरकिसलयक्लेशिना विक्षिपन्तीं
शुद्धस्नानात्परुषमलकं नूनमागण्डलम्बम् ।
मत्सम्भोग: कथमुपनमेत्स्वप्नजोऽपीति निद्रां
आकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥
भावानुवाद
आकपोल-लम्बित कच रूखे
जल-मज्जन से हुए कठोर,
अधर-पल्लवों को झुलसाती
आह जिन्हें देती झकझोर,
चाह रही, पर नींद न आती,
बाधित करती दृगजल-धार,
काश, मिलन हो सके स्वप्न में
ही मुझसे, कर रही विचार ।

साभार :--
 राम मोहन 'देववाणी संस्कृत'