ॐ श्री गुरुभ्यो नमः|| गुरु ब्रह्मा गुरु विष्णु गुरु देवो महेश्वर: | गुरु साक्षात् परब्रह्मा तस्मै श्री गुरवे नमः ||

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09 October 2015

बुद्धचरितम्

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बुद्धचरितम् (Buddhacharitam) अश्वघोषस्य प्रसिद्धं महाकाव्यम् अस्ति । अस्मिन् महाकाव्ये सप्तदश सर्गाः उपलभ्यन्ते। अयं ग्रन्थः बहुशः त्रिसहस्रश्लोकपरिमितः आसीदिति चीनादेशीयस्य प्रो.तककुसुमहाशयस्य भणितिरस्ति । किन्तु अधुना लभ्यमाने अस्मिन् काव्ये केवलम् १३६८ श्लोकाः सन्ति । किन्तु सप्तमेऽष्टमे वा शतके चीनाभाषया भाषान्तरिते, तिबतीयभाषया भाषान्तरिते बुद्धचरिते च २८ सर्गाः भवन्ति । एतेन ज्ञायते यत्, संस्कृतभाषायां "बुद्धचरितस्य" भागमात्रं लब्धम् इति ।
राजा शुद्धोदनः कपिलवस्तुनाम्नि नगरे राज्यभारं कुर्वन्नासीत् । तस्य पुत्रः सिद्धार्थः । सिद्धार्थः युवराजः । एतस्य समृद्धम् राज्यम्, प्रवृद्धः अधिकारः, सौन्दर्यवती प्रिया च भार्या यशोधरा । स्वर्गसमानं सुखमयम् जीवनं सिद्धार्थस्य आसीत् । तथापि सः वैराग्यमापन्नः कथम्? इति "बुद्धचरिते" वर्णितं कविना । तत्र महात्मनः बुद्धस्य सर्वांगीणचरितं निबद्धमस्ति। यथा-अभिनिष्क्रमणं, तपोवनगमनं, यशोधराविलापः, मगधयात्रावर्णनम्, सिद्धार्थस्य बुद्दत्वप्रापणम्, धर्मप्रचारः, शिक्षाप्रसारः इत्यादयः विषयाः सरलया भावपरिपूर्णया हृद्यावर्जकशैल्या वर्णिताः।अस्मिन् काव्ये बौद्धमतस्य पारिभाषिकाः शब्दाः यथेष्ठं विद्यन्ते । अश्वघोषः बौद्धमतस्य महायानपरम्परायाः प्रवर्तक आसीदिति बुद्धचरितादवगम्यते ।

वैराग्यस्य निमित्तम् :---
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बुद्धस्य वैराग्यप्राप्तौ किं कारणम्? इति प्रश्ने, राजकुमारः प्रथमे विहारसमये वृद्धं मार्गचारिणं दृष्ट्वा सूतं पृच्छति, यथात्र श्रुणुमो वयं कविवाणीम् एवम्-
क एष भोः सूत! नरोऽभ्युपेतः ? केशैः सितैर्यष्टिविषक्तहस्तः ।
भ्रूसंवृताक्षः शिथिलानताङ्गः , किं विक्रियैषा प्रकृतिर्यदृच्छा ॥ बुद्धच. ३-२८
अस्य सूतेन समुचितम् उत्तरम् दत्तम्, यथा-

रूपस्य हन्त्री व्यसनं बलस्य, शोकस्य योनिर्निधनं रतीनाम् ।
नाशः स्मृतीनां रिपुरिन्द्रियाणाम् एषा जरा नाम ययैष भग्नः ॥ बुद्धच. ३-३०
अपि च-

पीतं ह्यनेनापि पयः शिशुत्वे, कालेन भूयः परिमृष्टमुर्व्याम् ।
क्रमेण भूत्वा च युवा वपुष्मान्, क्रमेण तेनैव जरामुपेतः ॥ बुद्धच. ३-३१
यदा द्वितीयवारं सः विहारयात्रार्थं बहिर्गच्छति, तदा त एव देवाः रोगिणम् मनुष्यम् ससृजुः । तं दृष्ट्वा गौतमः सूतं पृच्छति यथा -

स्थूलोदरः श्वासचलच्छरीरः स्रस्तांसबाहुः कृशपाण्डुगात्रः ।
अम्बेति वाचं करुणं ब्रुवाणः परं समाश्लिष्य नरः क एषः? ॥
ततः सूतः तं वदति, " रोगाभिधानः सुमहाननर्थः" इति । तृतीयवारम् विहारयात्रासमये देवाः एकं गतश्वासं मनुष्यं ससृजुः । तम् अवलोक्य कुमारः " नरैश्चतुर्भिः ह्रियते क एषः? इति पृच्छति । तदा सूतः वदति यत्-

बुद्धीन्द्रियप्राणगुणैर्वियुक्तः सुप्तो विसंज्ञः तृणकाष्ठभूतः ।
संवर्ध्य संरक्ष्य च यत्नवद्भिः प्रियाप्रियैस्त्यज्यत एष कोऽपि । इति । एतच्छ्रुत्वा शौद्धोदनिः संविग्नमानसः भवति।
एवम् त्रिवारं राजकुमारस्य यात्रासमये शुद्धान्तवासिनो देवाः मायं ससृजुः । तदनुगुणं मार्गे युवराजः क्रमेण वृद्धं, रोगिणं, मृतं च पश्यति, पृच्छति च सूतम् । राज्ञा आदिष्टोऽपि सूतः अवाच्यमप्यर्थम् देवमायया मुग्धः जगतः सर्वां दुःखवार्तां विवृणोति । तेन कुमारः सिद्धार्थः संविग्नमानसः बभूव ।

अनुवाद-: :----
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बुद्धचरितस्य चीनीभाषायामनुवादः 420तमे ख्रीष्टाब्दे धर्मरक्षमहोदयेन कृतम्। अयं चीनीभाषानुवादः सैम्युअल बील महोदयेन आंग्लभाषायाम् अनुदितः। तिब्बतीभाषामाश्रित्य यः अनुवादः उपलभ्यते सः अपि जान्स्टन महोदयेन आंग्लभाषायां अनूदितः। 1940 तमे ख्रीष्टाब्दे अस्य पाठस्य हिन्दीभाषायामपि अनुवादः सूर्यनारायणचौधरिमहाभागेन कृतः। मया च भवनाथेन झोपाख्येन पुनः अनुपलब्धस्य अंशस्य संस्कृतभाषायाम् पद्यानुवादः अश्वघोषस्य काव्यरीतिमवलम्ब्य कृतः इति। अस्य पञ्चदशे सर्गे भगवान् बुद्ध धर्मस्यावश्यकतां प्रतिपादयतिः-

 मया प्रतिज्ञातमिमं हि लोकं निभाल्य दुःखार्णववीचिमग्नम्।
 सन्तारयिष्यामि तटं प्रयातः मुक्तान् विधास्यामि जनान् प्रमुक्तः।।7।।

प्राप्य श्रियं स्वार्थपरो जगत्यां जनो विजिह्रेति सदानुरक्तः।
 उन्मीलिताक्षस्तु धनं विशिष्टं लब्ध्वा वितार्यं हि जनेषु वेत्ति।।8।।

दृढस्थलस्थो यदि पूरवाहितं कुष्णाति नद्या न हि नास्ति शूरः।
 अवाप्तसम्पत्तिरथो दरिद्रान् न विभृयाच्चेन्न हि सोस्ति शूरः।।9।।

स्वस्थैर्यथा व्याधियुतो मनुष्यः चिकित्सितव्यः सुलभोपचारैः।
 सन्मार्गयातश्च तथैव योजयेद् गम्येन मार्गेण कुमार्गिणो जनान्।।10।।

03 October 2015

उपमा कालिदासस्य

उपमा कालिदासस्य
'उपमा कालिदासस्य' का अभिप्राय यह नहीं है कि किसी
अन्य कवि ने सादृश्यमूलक अलंकारों से अपनी कविता को
अलंकृत नहीं किया है । फिर कालिदास के लिए यह क्यों ?
कालिदास इस क्षेत्र में अनूठे जो हैं ! आइए, इसे समझने के लिए
संगत विषय पर कुछ परोक्ष चिन्तन कर लिया जाय ।
एक व्यक्ति एक फूलदार पौधे का रोपण करने के लिए पहले बहुत
अच्छी तरह मिट्टी तैयार करता है । फिर हल्की-सी सिंचाई
करके उसमें उस पौधे के बीजों को बोता है, फिर धूप और पानी
का निरन्तर ख़याल रखता है और आवश्यकतानुसार ही देशी खाद
भी डालता है । जब बीजांकुर धरती का पेट चीर कर झाँकने लगते
हैं तब वह उसकी लगातार सावधानी से देखभाल करता है ताकि
सही समय आने पर उसमें सुन्दर फूल खिल सकें । और, वह पल आता है
जब परिश्रम सार्थक होता है और सुगन्धित फूल खिलकर सारे
परिवेश को सुरम्य और सुरभित कर देते हैं । इन सुशोभन फूलों पर
अनेकों जीव अपनी जान छिड़कते हैं और उन पर अपना हार्दिक
उल्लास निछावर करते हैं । इसका सुपरिणाम यह होता है कि यह
सुन्दर पुष्पावली रसीले मधुर फलों के गुच्छों में रूपान्तरित हो
जाती है ।
एक दूसरा व्यक्ति इसे देखता है और वह पेड़ ही बाज़ार से ख़रीद
लाता है । सही देखभाल के अभाव में इस पेड़ पर या तो फूल आते
ही नहीं या बहुत ही छोटे अल्पविकसित अनाकर्षक फूल आते हैं ।
उसे पहले वाले व्यक्ति से ईर्ष्या होती है और वह बाज़ार से कुछ
फूल और फल ख़रीद कर लाता है तथा दर्शकों से छिपाकर उन्हें
पेड़ पर यत्र-तत्र लटका देता है । पर बाज़ार से ख़रीदे हुए फूल और
फल वह प्रभाव उत्पन्न नहीं कर पाते और शीघ्र ही उसकी पोल
खुल जाती है ।
एक तीसरा व्यक्ति तो इन सबका बाप निकला । वह नक़ली पेड़
ही घर पर ले आया और उसमें नक़ली फूल और नक़ली फल लटका
दिये ।
यही अन्तर है कालिदास के अलंकार-विधान में और अन्य कवियों
की अलंकार-योजना में । कालिदास को अलंकारों का कोई
लोभ-लालच नहीं, उनकी कविता तो सहज लावण्यवती है ।
किसी रूपवती स्त्री को आभूषणों से सज्जित होने की उतनी
ललक नहीं होती जितनी कि कुरूपा को होती है । वह दिन-भर
रूप-सिंगार करने में, न जाने, कितने प्रकार के यत्न करती रहती है
पर सहज रूप-सौन्दर्य के आकर्षण को कभी पा नहीं पाती ।
कालिदास के काव्य की भूमि ही अलंकारों के लिए उर्वरा है ।
वे काव्य-सृजन के मामले में सच्चे निष्काम कर्मयोगी हैं और फल
की क़तई चिन्ता नहीं करते । वह नहीं सोचते कि अलंकार सजाने
हैं इसलिए ऐसी भूमिका बनाएँ कि अलंकार सजाने का अवसर
बन जाए, अपितु वे तो काव्य की सम्प्रेषणीयता पर ही ज़्यादा
केन्द्रित रहते हैं । पाठक कहीं बिदक न जाए, कहीं उनकी
कविता बोझिल न हो जाए और पाठक पढ़ने से ही विमुख न हो
जाए, इसी पर सतत ध्यान रखते हैं कालिदास । अलंकारों के
नाहक बोझ से कविता की गतिशीलता ही ख़त्म हो जाती है ।
इसके लिए सहजता ही ज़्यादा ज़रूरी होती है, न कि अलंकार ।
जैसे सम्पूर्ण तैयारी के साथ पेड़ उगाने वाले माली को सुन्दर-
सुगन्धित फूलों और सुमधुर फलों का उपहार मिलना तय है, वह
फूलों के लिए उतना चिन्तित नहीं रहता जितना कि पेड़ के
स्वास्थ्य के प्रति होता है, वैसे ही सहज-सहज स्वाभाविक
रीति से किये गये कालिदास के काव्य में अलंकारों के साथ
पाठक की सुरुचि की निरन्तरता के फूल अवश्य खिलते ही हैं ।
जैसे सिंचित उपजाऊ भूमि में वन-सम्पदा बिना प्रयास के उग
आती है, वैसे ही कालिदास को अलंकारों के लिए अलग से श्रम
करना नहीं पड़ता है, अलंकार तो उनके काव्य की उपजाऊ
मिट्टी में अपना सौन्दर्य बिखरने के लिए सदैव उतावले रहते ही हैं
। सहजता ही काव्य-सौन्दर्य की जननी है, पर कलाबाजियों के
शौक़ीन अन्य कवियों को यह बात समझ ही नहीं आई और वे
सम्प्रेषण को छोड़कर व्यर्थ ही कविता को अलंकारों के नक़ली
सौन्दर्य से अपने काव्य को अलंकृत करने में जुट गये फलत: लाख
कलाबाज़ी करके भी वे कालिदास की बराबरी नहीं पा सके ।
अरे, बराबरी तो दूर, पास खड़े होने की भी ज़ुर्रत उनमें नहीं हैं ! मैंने
एक दिन पहले भी कहा था कि कालिदास को अपने प्रिय
पाठकों का बहुत ख़याल है और यही एक तत्त्व है जो उनकी
सर्वोच्चता का झण्डा कभी झुकने नहीं देता है । पदे-पदे
लालित्यं की जगह पदे-पदे सहजता कालिदास के काव्य का मूल
प्राण है । सहजता है तो लालित्य तो आएगा ही ! हिन्दी के
छात्र जानते हैं कि इसी सहजता के कारण मुंशी प्रेमचन्द कथा-
सम्राट् कहे जाते हैं ।
सहजता कोई बाहर से थोपी जाने वाली वस्तु नहीं है । वह तो
हमारा सबका स्वभाव है, वह हमारे साथ ही जन्मा है — सह + ज
= सहज, साथ जन्मा । जो हमारे स्वभाव का हिस्सा ही है, वह
हमें चाहे जहाँ दिखे या न दिखे, पर हमें आसानी से अंगीकृत हो
ही जाता है, सुगमता से स्वीकार्य हो ही जाता है । ट्रेन में एक
अजनबी भी हमारा अपना बन जाता है और हमारा मन जीत
लेता है, इसी सहजता के कारण । सहज कृत्य को समझने में हमारे
मन को कोई कसरत करनी नहीं पड़ती, वह तो ऐसे ही वहाँ
फिसलने लगता है जैसे गीले शीशे पर पैर फिसलता है । कालिदास
सृजन के समय पाठक-मन की इसी सहजता पर केन्द्रित रहते हैं और
जब देखते हैं कि वह काव्य-रस से सराबोर है, अलंकारों को ऐसे ही
धीरे-से उसमें खिसका देते हैं जैसे कोई शक्कर की चाशनी
( syrup ) में सुगन्ध की कुछ बूँदें टपका दे तो उसकी मधुरता सुरभित
भी हो जाती है और रसपान करने वाले के आनन्दातिरेक को
बढ़ा देती है । बाक़ी कवियों का हाल मत पूछो, वे करेले का रस
तैयार करते हैं और उसमें सुगन्ध डालने की कुचेष्टा करते हैं !
अलंकारों से उनकी कड़वी कविता और भी ज़्यादा त्याज्य हो
जाती है !
अक्सर कालिदास के 'मेघदूतम्' और महाकवि माघ के काव्य के
विषय में प्रसिद्ध टीकाकार मल्लिनाथ का यह जुमला लोगों
की ज़ुबान पर रखा ही रहता है — 'मेघे माघे गतं वय:', अर्थात्
मेघदूतम् और माघ के काव्य को पढ़ने में सारी उम्र ही बीत गई !
तो चलो, महाकवि माघ के एक समभावी श्लोक से मेघदूतम् के
आज प्रस्तुत श्लोक की तुलना करते हैं —
अनुनयौ विविधोपलकुण्डलद्युतिवितानकसंवलितांशुकम् ।
धृतधनुर्वलयस्य पयोमुच: शबलिमा बलिमानमुषो वपु: ॥
( माघ-कृत 'शिशुपालवधम्' ६/२७ )
माघ का यह श्लोक इस महाकाव्य में षड्ऋतु-वर्णन से है । इसमें
वर्षाकाल में इन्द्रधनुषी मेघ का चित्रण है । एक तो यह चित्रण
कालिदास ( मेघदूतम् ) के यहाँ प्रस्तुत श्लोक की फूहड़ जूठन
जैसा ही प्रतीत हो रहा है, दूसरे माघ ने इसे भाषा की दुरूहता
और अपने यमक अलंकार-प्रेम के दुर्भार्य बोझ से और क्लिष्ट बना
दिया है । इसे समझने के लिए इस श्लोक के निम्नांकित अर्थ पर
ग़ौर फ़रमाएँ —
" इन्द्रधनुष्-युक्त मेघ की विचित्रता ने अनेक मणियों से युक्त
कुण्डलों की कान्ति के समूह से मिश्रित छवि वाले तथा
दैत्यराज बलि को नष्ट करने वाले भगवान् वामन के शरीर का
अनुकरण किया ।"
एक तो सादृश्य-विधान ही निष्प्राण है, ऊपर से 'शबलिमा
बलिमानमुषो' में 'बलिमा' पद को अपने यमक-प्रेम के वशीभूत
होकर दो बार घुसेड़ना — इसे माघ की चातुरी समझें या
विवेकहीनता ! अलंकार-प्रेम की धुन में भाषा की सहजता और
लालित्य, न जाने, कहाँ उड़न-छू हो गये हैं ।
अब कालिदास के यहाँ प्रस्तुत श्लोक और मेरे द्वारा किये गये
उसके भावानुवाद पर ज़रा दृष्टिपात करें । वर्षा के आगमन पर
आकाश मेघाच्छन्न हो गया है । जंगल में दीमक की बाँभी के
ठीक ऊपर क्षितिज पर सप्तवर्णी इन्द्रधनुष् दिखाई पड़ता है ।
श्याम मेघों के बीच इन्द्रधनुष् की छवि ऐसी लग रही है जैसे
सामने मोरमुकुटधारी गोपाल कृष्ण खड़े हों । मोर-पिच्छ में
विविध चमकीले रंगों की छटा से सब परिचित हैं ही । श्याम
मेघों की कान्ति कृष्ण के श्याम शरीर से पूरा साम्य रखती है ।
इसे कहते हैं सम्पूर्ण सादृश्य । इसके सामने माघ की उपर्युक्त उपमा
लँगड़ी प्रतीत हो रही है । कहा जाता है कि माघ में
कालिदास का उपमा-कौशल, भारवि का अर्थ-गाम्भीर्य और
दण्डी का पद-लालित्य — तीनों एक साथ उपलब्ध होते हैं । पर
उपमा-कौशल तो माघ का आपने देख ही लिया, बाक़ी की
चर्चा हम तब करेंगे जब भारवि और दण्डी का ज़िक्र होगा ।
फ़िलहाल हम यहाँ मल्लिनाथ जी के उपरोक्त कथन पर यही
कहना चाहेंगे कि मेघदूत को पढ़ते हुए सारी उम्र ही बीत सकती है
पर पाठक उसके रस से कभी नहीं अघाता, चाहे कितनी ही बार
मेघदूत को पढ़ जाए । लेकिन माघ की जटिलता को समझने में तो
सारी उम्र ही बीत जाएगी पर माघ समझ में ही नहीं आएँगे ! 'मेघे
माघे गतं वय:' — दोनों के लिए ही उम्र कम पड़ जाती है, एक का
तो बस रसपान करने के लिए और दूसरे को सिर्फ और सिर्फ
समझन-भर के लिए !
मेघदूतम् १-१५
रत्नच्छायाव्यतिकर इव प्रेक्ष्यमेतत्पुरस्तात्
वल्मीकाग्रात्प्रभवति धनु:खण्डमाखणडलस्य ।
येन श्यामं वपुरतितरां कान्तिमापस्यते ते
बर्हेणेव स्फुरितरुचिना गोपवेषस्य विष्णो: ॥
भावानुवाद
आखण्डल का चाप-खण्ड यह, विविध मणिप्रभा से रञ्जित,
दीख रहा सम्मुख बाँभी की चोटी पर होकर मण्डित ;
गोप-वेष-धारी हरि की ज्यों मोर-पिच्छ से कान्ति अनूप,
उसी विमल छवि को पाएगा, तात, तुम्हारा श्यामल रूप ॥
साभार :--
— राम मोहन 'देववाणी संस्कृत'

मेघदूत में विरह-चित्रण-२

मेघदूत में विरह-चित्रण-२
( शब्द-शक्ति के सन्दर्भ में )
निर्जीव शब्द-समूहों को जो चैतन्य शक्ति स्फुरित कर जीवन्त
बना देती है, वह शब्द-शक्ति कहलाती है । शब्द-शक्ति सामान्य
और साधारण-से दिखने वाले शब्द-समूहों को जीवन्त और ऊर्जा-
पुञ्ज बना देती है और उनमें अर्थगत विविधता भर देती है । एक ही
प्रकार के शब्द-समूह से खेलता हुआ कवि-रूपी कलाकार उसमें
अपनी मनोगत चेतना फूँक कर विभिन्न अर्थों और भावों की
सृष्टि करता रहता है । चूँकि शब्द-शक्ति रूपी इस अद्भुत ऊर्जा
का संचार कवि-मन से होता है और जैसा कि विधाता निर्जीव
शरीरों को चेतना से भर कर उन्हें प्राणवान बनाते हैं और एक-से
हाड़-माँस से बने पुतलों में भी अपने रचना-कौशल से वैविध्य भर
देते हैं, वैसे ही शब्द-शक्ति से संचालित कवि का सृजन-कर्म है ।
कदाचित् इसीलिए कवि धरती पर विधाता की प्रतिकृति
कहा जाता है — कविर्मनीषी परिभू स्वयंभू । वह निष्प्राण
शब्दाक्षरों में प्राण संचार करता है और विविध रंगों वाली
मनोमय सृष्टि की रचना करता है ।
हम बोलचाल की भाषा में भी शब्द-शक्तियों का सुन्दर प्रयोग
करते रहते हैं । काव्यशास्त्रियों ने शब्द-शक्ति के तीन रूप बताये हैं
— अभिधा, जैसा शब्द ने 'धारण' कर रखा है, वैसा ही सीधा-
सपाट बिना लाग-लपेट वाला अर्थ जिस शब्द-शक्ति के कारण
सम्प्रेषित होता है, वह अभि+'धा' कहलाती है, लक्षणा, जिसके
द्वारा अर्थ शब्दों में निहित परिलक्षित लक्षणों से प्रकट
होता है, वह लक्षणा है, और व्यञ्जना, जो न तो शब्दों के सीधे
अर्थ का सहारा लेती है और न ही उन शब्दों से अभिलक्षित
( इंगित ) होने वाले अर्थ को ग्रहण कराती है, अपितु शब्द की
आत्मा में से ही शब्दाशय का सम्प्रेषण कराती है और शब्दार्थ
को वाणी या मुख-मुद्राओं की अपेक्षा मन से ही ग्रहण करने
की ताक़त देती है और जिसके कारण शब्द में अन्तर्निहित भाव
पाठक के मन में गूँज उठता है, अभिव्यञ्जित हो जाता है, वही
व्यञ्जना शक्ति है । हमारे देश में एक प्रान्त है हरियाणा जिसमें
और उसके पास-पड़ौस के इलाक़े में आम आदमी भी बात-बात में
व्यञ्जना शब्द-शक्ति का प्रयोग करता है । हिन्दी के सुप्रसिद्ध
हास्य कवि सुरेन्द्र शर्मा ने इस शब्द-शक्ति के आधार पर ही
अपना समस्त काव्य-संसार रच डाला है । मैं जब बागपत में तैनात
था तब मैं वहाँ के सुसभ्य नागरिकों को अक्सर कहा करता था —
आओ, कविवर ! वे चौंकते थे और मैं उन्हें समझाता था कि तुम तो
सभी लोग जन्मजात कवि ही हो । व्यञ्जना के प्रयोग से
भाषाएँ जीवन्त हो उठती हैं । व्यञ्जना की ताक़त मुर्दे में भी
प्राण फूँक देती है ! इस सृष्टि का सबसे प्रबुद्ध प्राणी इन्सान है
और इन्सानों में भी सबसे प्रबुद्ध कवि, कारण वह व्यञ्जना शब्द-
शक्ति के हाथों अपना रचना-संसार सजाता है । हमारे शरीर में
सबसे बलवान मन है और कवि व्यञ्जना के प्रयोग से इसी मन को
काबू में करने का यत्न करता है । जिस बात को कहने में कई वाक्य
लिखने पड़ते हैं, व्यञ्जना उसे कुछ ही शब्दों में सम्प्रेषित करा
जाती है और सुनने वाले को मन्त्रमुग्ध और वशीभूत होने पर विवश
कर देती है । जिस कवि ने इस शब्द-शक्ति का जितना अधिक
कुशलता से उपयोग किया, वह उतना ही महान् होता गया ।
व्यञ्जना काव्य की प्राण-शक्ति ही है ।
कालिदास का सम्पूर्ण रचना-कौशल ही इसी शब्द-शक्ति का
किया हुआ शृंगार है । कालिदास शब्दों को उनकी आत्मा के
भीतर से ध्वनित कराते हैं । कालिदास के शब्द बाहरी जगत् में
घण्टा-नाद नहीं करते अपितु वे मन को ही लम्बे वक़्त तक
गुञ्जायमान कर जाते हैं । बाहरी ध्वनियाँ और प्रतिध्वनियाँ
पल-दो-पल की ही मेहमान होती हैं, लेकिन मनोमय जगत् को
गुंजित करने वाली ध्वनि अपना दीर्घकालीन प्रभाव छोड़ती है
। मन की गूँज मस्तिष्क के साथ-साथ हृदय को भी गुंजित कर
जाती है और उससे जो सकरुण मर्मभेदी रसधार स्रवित होती है,
वही तो कवि-कर्म का स्तुत्य प्रसाद है । कालिदास इस कला में
सिद्धहस्त हैं क्योंकि वे व्यञ्जना के प्रयोग के धुरन्धर कविरत्न हैं

पिछली प्रस्तुति में मैंने कालिदास के 'मेघदूतम्' से विरहिणी
यक्षिणी का एक लक्षणा-मण्डित शब्द-चित्र प्रस्तुत किया
था जिसमें कवि की वर्णन-चातुरी आपने देखी ही है । आज हम
देखेंगे कि अपनी प्रिय शब्द-शक्ति व्यञ्जना के हाथों वे उसी
विरहिणी का कितना भव्य चित्रांकन करते हैं । प्रस्तुत श्लोक
को उसके पद्यमय भावानुवाद के साथ हृदय में उतारिये और अपनी
सहृदयता से कालिदास की आत्मा को उपकृत कीजिए, प्रिय
अनन्य सुहृज्जन !
मेघदूतम् २-३०
पादान्निन्दोरमृतशिशिरान् जालमार्गप्रविष्टान्
पूर्वप्रीत्या गतमभिमुखं सन्निवृत्तं तथैव ।
चक्षु: खेदात्सलिलगुरुभि: पक्ष्मभिश्छादयन्तीं
साभ्रेऽह्नीव स्थलकमलिनीं न प्रबुद्धां न सुप्ताम् ॥
भावानुवाद
खिड़की से आती चन्दा की
मधुर सुधा-सी शीत किरण,
देखा होगा प्रेम-विवश, फिर
फेरे होंगे दुखी नयन,
पलक बन्द फिर किये अश्रु-भर,
जगी न सोई होगी, तात !
खिली न हो, अनखिली न भी हो,
मेघ-भरे दिन ज्यों जलजात ।
— राम मोहन 'देववाणी संस्कृत'
पूर्व दिशा में अपनी षोडश कलाओं सहित कलानिधि ( चन्द्र
देव ) आकाश में उग आये हैं । विरहिणी नायिका के भवन की
खिड़की उसी दिशा में है । चन्द्रमा का सौन्दर्य किसे नही
लुभा लेता और फिर उसमें तो उसे अपने बिछुड़े प्रियतम के सुन्दर
मुखड़े की छवि भी दीख पड़ी है । सुन्दर चन्द्रमा प्रिय की याद
दिला ही देता है । पर जिस पल इस सौन्दर्य पर ध्यान जाता है
और मन उसकी आनन्दानुभति को अनुभव करता ही है, उसी पल
प्रियतम का वियोग भी स्मरण हो आता है जो दिल में छुरी
भोंक देता है । वियोग-पीड़ा का साक्षात्कार असहनीय हो
उठता है और वियोगिनी उधर से ( चन्द्र की तरफ़ से ) अपने नयन
फेर लेती है । आँसुओं की धार उसके सुन्दर मुखड़े का श्रीहरण कर
लेती है । चन्द्रमा एक ओर प्रियतम के मुखड़े का सादृश्य उपस्थित
करके आनन्दित करता है, पर उसी पल दूसरी ओर प्रिय के बिछुड़े
होने की पीड़ा हृदय से नेत्रों में भी उतर आती है । उस रात नींद
कैसे आये, बार-बार प्रिय का स्मरण करते रहने को मन विवश जो
कर देता है, लेकिन वियोग-दु:ख की असहनीयता में वियोगिन
चाहती है कि उसे नींद आ जाए और वह दु:ख भूल जाए । इसी
उधेड़बुन मे विरहिणी रात-भर न ठीक से सो ही पाती है और न
ठीक से जाग ही पाती है । मेघाच्छन्न दिवस में कमलिनी की
जो दशा होती है, उसकी एक गतिशील सम्पूर्ण उपमा देकर
कालिदास न सुन्दर प्रस्तुति को सुन्दर से सुन्दरतम बना डाला
है ! इस दृश्य को देखकर या सुनकर कोई भी भावुक सहृदय रोये
बिना नहीं रह सकता ! वियोगगत विवशता का इससे सुन्दर
रूपांकन हो ही नहीं सकता । यहाँ रचना के शब्द न तो प्रियतम के
वियोग की स्मृति का उल्लेख कर रहे हैं और न वियोगिनी के
चन्द्रमा की ओर से मुख फेर लेने का कारण ही सुस्पष्ट रूप से लिखे
हैं, पर भाव तो तीर की तरह पाठकों के दिल को चीर ही गया है
। बिन कहे भी सब कुछ कह डाला, यही तो है व्यञ्जना शब्द-
शक्ति का चमत्कार ! इसकी ताक़त का अन्दाज इसी से
लगाया जा सकता है कि सहृदय पाठक को यह शब्द-चित्र रात-
भर रोते रहने पर विवश कर सकता है । कालिदास इसीलिए
पाठकों के हृदय पर राज करते हैं और इसीलिए आज भी उन जैसी
प्रतिभा का धनी कोई और नहीं हुआ है । हमारा महाकवि के
चरणों में शत-शत नमन !

मेघदूत में विरह-चित्रण

. मेघदूत में विरह-चित्रण
( शब्द-शक्ति के सन्दर्भ में )
विरह हृदयगत भाव है । विरह का चित्रण करने में कालिदास ने
अधिकतर भाषा की व्यञ्जना शक्ति का सहारा लिया है ।
कालिदास मूलत: व्यञ्जना के ही कवि हैं । व्यञ्जना शब्दों के
भीतर से काव्य की आत्मा को प्रकट कर देती है और पाठक को
उस भावदशा में सहजता से ले चलती है जहाँ वह कवि के अन्त:करण
के समक्ष स्वयं को खड़ा पाता है । व्यञ्जना के माध्यम से कवि-
मन से सीधा साक्षात्कार होता है । इस प्रकार व्यञ्जना
काव्य के साधारणीकरण की मुख्य संवाहिका ऊर्जा है । वह
कविता की सम्प्रेषणीयता बढ़ा देती है । लेकिन महाकवि ने
यत्र-तत्र लक्षणा शक्ति का भी सहारा लिया है । लक्षणा
शक्ति कविता में ऐसे ही है जैसे कोई नटी अपने वस्त्र-भूषा और
शृंगार आदि के माध्यम से अपने हृदयगत भावों को व्यक्त कर रही
हो जबकि व्यञ्जना शक्ति ऐसे है जैसे मानों वही नटी बिना
वस्त्राभूषण की अपेक्षा किये ही केवल अपनी मुख-मुद्राओं और
हावभावों से ही हृदयगत भावों को सम्प्रेषित करती हो ।
यहाँ प्रस्तुत 'मेघदूतम्' का श्लोक कालिदास द्वारा लक्षणा
शक्ति के प्रयोग का सुन्दर उदाहरण है ।
मेघदूतम् २-३१
नि:श्वासेनाधरकिसलयक्लेशिना विक्षिपन्तीं
शुद्धस्नानात्परुषमलकं नूनमागण्डलम्बम् ।
मत्सम्भोग: कथमुपनमेत्स्वप्नजोऽपीति निद्रां
आकाङ्क्षन्तीं नयनसलिलोत्पीडरुद्धावकाशाम् ॥
भावानुवाद
आकपोल-लम्बित कच रूखे
जल-मज्जन से हुए कठोर,
अधर-पल्लवों को झुलसाती
आह जिन्हें देती झकझोर,
चाह रही, पर नींद न आती,
बाधित करती दृगजल-धार,
काश, मिलन हो सके स्वप्न में
ही मुझसे, कर रही विचार ।

साभार :--
 राम मोहन 'देववाणी संस्कृत'

29 September 2015

रघुवंशमहाकाव्यम्

रघुवंशम् महाकविकालिदासेन विरचितमेकं महाकाव्यमस्ति।
रघुवंशम् एकोनविंशति-सर्गात्मकम् एकं लालित्यपूर्णं महाकाव्यं
अस्ति महाकवेः कालिदासस्य । अत्र रघुवंशस्य कथा निबद्धा
अस्ति । दशमसर्गादारभ्य पञ्चदशसर्गपर्यन्तं रामस्य कथा
वर्णिता अस्ति । तदुत्तरं रामवंश्यानां तत्तनृपाणां चरितानि
उपन्यस्तानि । अन्तिमः सर्गः अग्निवर्णस्य राज्याभिषेकेण
समं समाप्यते । कालिदासः अग्निवर्णपरवर्तिनां राज्ञाम्
अपि वर्णनं चिकीर्षति स्म , परम् असौ कालेन कवलीकृतः इति
एकेषां मतम् । अन्ये पुनः कालिदासेन परतः अपि रघुवंशस्य
सर्गाः लिखिताः; परन्तु ते न प्राप्यन्ते इत्याहुः । रघुवंशे येषां
राज्ञां वर्णनानि सन्ति , तेषां रामायणवर्णितनृपैः सह भेदः
आपतति , परन्तु वायुपुराण-वर्णितानुसारं रामवंशावल्या सह
रघुवंशवर्णित - वंशावली भूयसा सामञ्जस्यं धारयति ।
एकोनविंशति (१९) सर्गेषु वर्णिता रघुवंशीयराज्ञां
नामावलिः यथाक्रमम् अत्र उल्लिखिताः सन्ति । यथा-
दिलीपः,
रघुः,
अजः,
दशरथः,
रामः,
कुशः,
अतिथिः,
निषधः,
नलः,
नभः,
पुण्डरीकः,
क्षेमधन्वा,
देवानीकः,
अहीनगुः,
पारियात्रः,
शिलः,
उन्नाभः,
वज्रनाभः,
शंखणः,
व्युषिताश्वः,
विश्वसहः,
हिरण्यनाभः,
कौसल्यः,
ब्रह्मिष्ठः,
पुत्रः
पुष्यः,
धृवसन्धिः,
सुदर्शनः,
अग्निवर्णः च
एतेषु राजसु रामस्यैव वृत्तं सर्वाधिकसर्गेषु वर्णितमस्ति ।
कथा
===========
रघुः सेनया सहितः वक्षुतीरं प्राप्य हूणैः म्लेच्छैः च सह अयुध्यत।
विक्रमः रघुः तान् जितवान्। वक्षुं तीर्त्वा तस्य सेना
कम्भोजान् अमिलत्। ते रघवे उपहारान् दत्तवन्तः। कालिदासः
वक्षुतीरे स्थितान् अक्षोटवृक्षान् अपि वर्णितवान्।

किरातार्जुनीयम् परिचय

महाकविः भारविः शैवमतावलम्बी , प्राकाण्डपण्डितः,
राजनीतिज्ञः, वीररसवर्णनकुशलः, अलङ्कृतशैल्याः प्रवर्तकः
च आसीत् । भारविणा निजपरिवारस्य , निवासस्थानस्य,
पितुः, पितामहस्य, गुरोर्वा विषये कोप्युल्लेखो न कृतः
किरातार्जुनीये । दण्डिविरचितम् अवन्तीसुन्दरीकथ
ा अनुसारेण कुशिकगोत्रीयाः ब्राह्मणाः आनदपुरे निवसन्ति
स्म । ततः परं ते वरारप्रान्ते अचलपुरे एलिचपुरे वा आगत्य
निवासम् अकुर्वन् । अस्मिन्नेव वंशे नारायणस्वामी जातः ।
तस्य पुत्रः एव दामोदरः आसीत् । अयमेव दामोदरः भारविः
इति नाम्ना प्रख्यातः अभवत् । तत्र भारविविषयकः श्लोकः
अयं प्राप्यते -
"स मेधावी कविर्विद्वान् भारविं प्रभवां गिराम् ।
अनुरुध्याकरोन्मैत्रीं नरेन्द्रे विष्णुवर्धने ॥"
इत्थं भारविः दण्डिनः प्रपितामहः आसीत् । तस्य
स्थितिकालः ६०० ईसवीयसमीपे मन्यते । अस्य
‘किरातार्जुनीयम्’ नाम एकमेव महाकाव्यं प्राप्यते; यत्
बृहत्त्रय्यां प्रथमस्थाने’ परिगणितम् । संस्कृतविद्वत्समाजे
‘भारवेरर्थगौरवम्’, ‘नारिकेलफलसम्मितं वचो’ ‘स्पुटता न
पदैरपाकृता’ इत्याभणकानि सुप्र्सिध्दानि एव ।
महाकविभारविकृते किरातार्जुनीयमहाकाव्ये तज्जीवन
विषयकसाक्ष्याभावात् बाह्यसाक्ष्यानुसारं तस्य
कालनिर्धारण् करणीयम् ।
दक्षिणभारते एहोलग्रामे ६३४ खिष्टीया जैनकविना
रविकीर्तिना लिखितशिलालेखे “ स विजयतां रविकीर्तिः
कविताश्रितकालिदासभारविकीर्तिः” इत्यनेन ज्ञायते यत्
सप्तम शताब्दयाः पूर्वार्ध्दं यावत् भारविः सुविख्यातः
कविरासीत् ।
काव्यकलायाः उत्तरोत्तरप्रभावदृष्ट्या कालिदासः भारवेः
पूर्ववर्ती महाकविमाघश्च उत्तरवर्ती कविरासीत् । माघस्य
स्थितिकालः ७०० ख्रिष्टीयाब्दः मन्यते, अतः भारवेः
स्थितिकालः षष्ठशताब्धाः उत्तरार्ध्दे भवैतुमर्हति ।
काशिकायां भारवेः (किरात ३/१४) इत्युध्दरणं प्राप्यते । अतः
भारवेः कालः वामनजयादित्याभ्यां (सप्तमशताब्दी –पूर्व)
षष्ठशताब्धाः उत्तरार्ध्दे भवेत् ।
अवन्तीसुन्दरीकथा – अनुसारं दण्डिनः प्रपितामहः
दामोदरः एव ‘भारविः’ यः विष्णुवर्ध्दनस्य (६१५ ई.)
समापण्डितो आसीत् । अतः तस्य कालः षष्ठशताब्द्याः
उत्तरार्ध्दे भवितुमर्हति । निष्कर्षरुपेण एवं प्रतिभाति यत्
भारवेः स्थितिकालः षष्ठशताब्द्याः उत्तरार्ध्दे
सप्तमशताब्द्याः पूर्वार्ध्दे (५५०-६०० ई.) भवैतुम् अर्हति ।
महाकविभारविना महाभारतकथामाश्रित्य अलंकृतकलापक्षप्
रधानशैल्या विरचितं अष्टादशसर्गात्मकं वीररसप्रधानम्
अर्थगाम्भीर्ययुक्तं बृहत्त्रय्यां प्रथमपरिगणितं
‘किरातार्जुनीयम्’ नाम एकमेव महाकाव्यं समुपलभ्यते । अस्य
ग्रन्थस्य शुभारम्भः ‘श्री’ शब्देन, सर्गान्तः ‘लक्ष्मी – शब्देन च
भवति । अत्र अर्जुनस्य किरातवेशधारिणा शङ्करेण सह युध्दं
वर्णितम् । अत एव ग्रन्थस्य नामकरणं कृतं – ‘किरातार्जुनीयम्’
किराताश्च अर्जुनश्च किरातार्जुनौ (द्वन्द्वः)
किरातार्जुर्नौ अधिकृत्य कृतं काव्यं किरातार्जुनीयम् ।
किरातार्जुन + छ (‘ईय’ आदेशः) अर्जुनाय दिव्यास्त्राणां
प्राप्तिरेव महाकाव्यस्य फलम् । अतः ग्रन्थस्यास्य नायकः
अर्जुनः नायिका च द्रौपदी वर्तते । अर्थगौरवं, स्पष्टता,
पुनरुक्तेरभावः अलंकृतशब्दयोजनाश्च अस्य महाकाव्यस्य
वैशिष्ट्यम् । भारविना एकाक्षरद्वयक्षर श्लोकाः अपि
रचिताः । तद्यथा – “ न नोनन्नुनो नाना नानानना ननु”
किरात. १५/१४. ग्रन्थेऽस्मिन् ऋतुवर्णनं, हिमालयवर्णनं,
सन्ध्यावर्णनं, चन्द्रवर्णनं, प्रभातमित्यादीनां रोचकं रमणीयञ्च
चित्रणं विद्यते । एवमेव पञ्चदशे सर्गे चित्रकाव्यस्य वर्णनं
दर्शनीयम् । प्रथमसर्गे द्रौपद्याः कथने या वचनचातुरी विद्यते,
सा अन्यत्र दुर्लभा एव ।
कविपरिचयः
============
किरातार्जुनीयं महाकविना भारविणा रचितमेकं महाकाव्यम्
अस्ति। भारवेः एषा एका एव कृति: उपलभ्यते।
आवन्तिसुन्दरीकथानुसारेण महाकविः दण्डी भारवेः
प्रपौत्रः आसीत्। एषः कौशिकगोत्रीयः आसीत्। अस्य
पूर्वजाः गुर्जरप्रदेशस्य आनन्दपुरनगरे वसन्ति स्म।
नारायणस्वामी तस्य पिता। भारवेः मूलनाम दामोदरः
आसीत्। भारविः तस्य उपाधिः आसीत्।
कृतिपरिचयः
==============
किरातार्जुनीयस्य कथानकस्य मूलाधारः महाभारतम् अस्ति।
महाभारतस्य अष्टादशसर्गेषु वनपर्वणि किरातार्जुनीयस्य कथा
अस्ति। अत्र किरातः तत्वेषधारी शिवः अस्ति। महाभारतात्
संक्षिप्तकथानकं स्वीकृत्य भारविः स्वकल्पनाभिः
काव्यप्रतिभयाच कथानके मौलिकताम् उत्पादितवान्।
महाभारतस्य शैली सरला अस्ति किन्तु किरातार्जुनीयस्य
शैली क्लिष्टा अलङ्कृता च अस्ति। महाकाव्यलक्षणानुरोधेन
भारविः स्थाने स्थाने ऋतु- पर्वत- नदी- वन- प्रातः-सन्ध्याद
ीनाम् अपि सुन्दरं वर्णनं कृतवान्। भारवेरर्थगौरवम् इत्युक्त्यनुसार
म् किरातर्जुनीयस्य अर्थगौरवम् अतिव प्रसिद्धम् अस्ति।
चित्रकाव्यस्य चमत्कारं प्रदर्शयन् भारविः एकव्यञ्जनस्य
प्रयोगेण अपि श्लोकानां निर्माणं कृतवान्।
उदाहरणार्थं श्लोकमेकम् अत्र दत्तम्।
"न नोन नुन्नो नुन्नानो नाना नानाननाननु।
नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेना नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥"
(किरातार्जुनीयम्)

28 September 2015

महाभारतम्

महाभारतस्य रचनाकालः नामकरणञ्च
महाभारतग्रन्थः त्रिभिः सवंत्सरैः विरचितं च -
त्रिभिर्वर्षैः सदोत्थाय कृष्णद्वैपायनो मुनिः।
महाभारतमाख्यानं कृतवानिदमद्भुतम्॥
इदं प्रायः सर्वे भारतीया विद्वांसो मन्यन्ते यत् महाभारतं
प्राग् जयनाम्ना ततो भारतनाम्ना ततः परतश्च
महाभारतनाम्ना प्रसिद्धम् । सूक्ष्मेक्षिकयाऽवलोकनेन
ज्ञायते यत् - महाभारतस्य प्रगते चरणत्रयं विद्यते।
(1.) प्रथमे चरणे :---
================
जयनामकं काव्यमेतत् ८८०० श्लोकपरिमितं व्यासकृतं धर्मचर्चाम्
आश्रित्य महर्षि व्यासेन स्वशिष्याय वैशम्पायनाय
श्रावितमभूत्।
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत्।।
प्रत्येकस्य अध्यायस्य आदौ विद्यमानः अयं प्रसिद्धः श्लोकः
इदं निरूपयति ।
(2.) द्वितीये चरणे :---
===================
भारतनामकं महाकाव्यमेतत् वैशम्पायनकृतं २४
सहस्रश्लोकपरिमितं (चतुर्विंशतिसाहस्री) वैशम्पायनेन
अर्जुनस्य प्रपौत्राय जनमेजयाय नागयज्ञे श्रावितमभूत्।
(3.) तृतीये चरणे :----
===================
महाभारतनामकं महाकव्यमेतत् लोमहर्षपुत्रेण सौतिकेन रचितं -
एकलक्षश्लोकपरिमितं नैमिषारण्ये यज्ञकाले शौनकादिभ्यः
ऋषिभ्यः श्रावितमभूत्। एवञ्च आख्यानमिदं त्रिभिर्वक्तृभि
ः महर्षिभिः विभिन्नश्रोतृभ्यः श्रावितम्।
महाभारतस्य अन्ते विद्यमानेन श्लोकेन इदं प्रमाणितं भवति -
उक्तं शतसहस्राणां श्लोकानामिदमुत्तमम्।
अस्य ग्रन्थस्य नूतनतमस्य रूपस्य नाम शतसाहस्री संहिता अपि
अस्ति।
श्रीकृष्णदौत्यम्
====================
महाभारतं कस्मिन् शास्त्रेऽन्तर्भवति ।
प्रथमं महाभारतम् इतिहासः पुराणम् आख्यानकञ्चेति
नामभिः आख्यायते स्म । साम्प्रतिकास्तु महाभारतम्
आचारशास्त्रम् नीतिशास्त्रम् धर्मार्थकाममोक्षाख्य-चतुर्वर्ग
साधनम् चामनन्ति । भारतं पञ्चमो वेदः इति सर्वत्र प्रचारितम्
। सर्वत्रास्मिन् ग्रन्थे वैष्ण्वसिद्धान्तानां प्रमुखत्वेन
प्रतिपादनात् महाभारतं वैष्णवस्मृतिरप्याख्यायते ।
महाभारतस्य अशीतिप्रतिशतभागोऽनेकविधोपदेशमयः,
विंशतिप्रतिशतभाग एवेतिहासप्रतिपादक इति अस्य
नीतिशास्त्रेषु गणनोचिता ।
महाभारतस्य रचनाकालः---
==========================
सम्प्रत्युपलभ्यमानं महाभारतं मूलमहाभारतात् परतो बहुषु शतकेषु
व्यतीतेष्वेव निर्मितं स्यादतो मूलमहाभारतस्य जयाभिधानस्य
वर्तमानमहाभारतात् पूर्वकालिकत्वं निश्चितम् । अत्र
वर्तमानमहाभारतस्य रचनाकालसम्बन्धे विचारणीयमस्ति, तत्र

(१.) ख्रीष्टैकादशशतके जातेन क्षेमेन्द्रेण कृतो
भारतमञ्जरीनामा ग्रन्थः कथायां वर्तमानमहाभारतम
नुहरतीति वर्तमानमहाभारतस्य एकादशशतकपूर्वकालिकत्वं
सर्वथा सिद्धम् ।
(२.) अष्टमशतकोत्तरार्धे जातः आद्यशङ्कराचार्यः महाभारतं
स्त्रीभिः धर्मज्ञानाय अध्येयत्वेन आदिशन्ति, तेन
महाभारतस्य ततः पूर्वकालिकत्वं सिद्धम् ।
(३.) अष्टमशतकोत्पन्नाः कुमारिलभट्टाः महाभारतस्य बहूनि
पर्वाणि स्मरन्ति ।
४. सप्तमशतकोत्पन्ना बाणसुबन्धुप्रभृतयः कवयो महाभारतस्य
अष्टादश पर्वाणि हरिवंशं च स्मरन्ति ।
(५.) कम्बोडियानामके भारतस्य प्राचीनोपनिवेशे
षष्ठशतकसमीपे उत्कीर्णात् शिलालेखात् ज्ञायते यत् तत्रत्याय
कस्मैचिन्मन्दिराय रामायणमहाभारतग्रन्थौ भारतेन प्रहितौ
। तत्कथाप्रबन्धोऽपि भारतेन कृतः ।
(६.) यवबालिप्रभृतिषु द्वीपेषु षष्ठशतके महाभारतमवर्त्तत,
ततोऽपि पूर्वं तिब्बतभाषायां महाभारतस्यानुवादो जातः ।
(७.) चतुर्थपञ्चमशतकलिखितेषु दानपत्रकेषु स्मृतिरूपेण
महाभारतवचनानि निर्दिष्टानि दृष्टानि ।
(८.) ४६२ स्त्रीष्टोत्की-एकत्र शिलालेखे पाराशर्यव्यासस्य
लक्षश्लोकात्मकस्य महाभारतप्रणेतृत्वम् उल्लिखति ।
(९.) सीरियादेशभाषायाम् उपलभ्यमानस्य शान्तिपर्वाध्या
यत्रयस्य साक्ष्येण हर्टलमहोदयः प्रमाणयति यत् प्रचलितं
महाभारतम् ई.पू. पञ्चमशतकनिबद्धात् महाभारतात् न भिद्यते
इति ।
(१०.) डयोन क्राइसोस्तोम (Dion Chyrsostom) महोदयस्य
साक्ष्येण प्रतीयते यत् ५० ख्रीष्टाब्दकाले लक्षपद्यात्मकं
महाभारतं दक्षिणपथे लब्धप्रचारमासीत् इति ।
(११.) ख्रिष्टप्रथमशतके स्थितेन वज्रसूचीकृत्ताश्वघोषेण
हरिवंशस्थ पद्यमेकमुद्धतम् । एभिः सर्वैः समुदितैरेतत् सिद्धं यत्
ख्रीष्टशतकप्रारम्भे महाभारतम् अवश्यम् अवर्तत । अपि च –
(क) पाणिनिः महाभारतं जानाति स्मेति डल्ह्मैन
(Dalhmann) साक्ष्येण प्रतीयते ।
(ख) ख्रीष्टपूर्वपञ्चमशतकप्रणीते आश्वलायनगृह्यसूत्रे
महाभारतस्य उल्लेखो दृश्यते ।
(ग) ४०० ई.पू समये निर्मिते बौधायनधर्मसूत्रे महाभारतस्योल्ले
खो दृश्यते ।
(घ) बौधायनगृह्यसूत्रे महाभारतीयं विष्णुसहस्रनामोद्ध्रियते
स्म ।
(ङ) महाभारतीयशान्तिपर्वणि विष्णोर्दशावतार
गणनाकालेबुद्धस्य नाम नायाति ।
(च) मेगास्थनीजप्रणीते भारतवर्णने याः कथाः ता
महाभारतात् एव प्राप्ताः ।
(छ) ब्रह्म सर्वदेवज्येष्ठतया महाभारते प्रतिपादितः ।
पालिभाषासाहित्येन ज्ञायते यद् ब्रह्मणो ज्यैष्ठत्वं
ख्रीष्टपूर्वपञ्चमशतकात् प्रागेव प्ररूढप्रचारमासीत् ।
(ज) ज्यौतिषप्रमाणैः अपि कतिपये विद्वांसः कल्पयन्ति यत्
वर्त्तमानं महाभारतम् ५०० ई.पू. समयात् प्रागेव निर्मितं न ततः
परम् ।
अतः सर्वसमीक्षया महाभारतम् ५०० ई.पू. समयतः परतो न
निर्मितं किन्तु कदाचित् पूर्वमेव निर्मितमिति प्रतीयते ।
महाभारतकथासारांशः----
=========================
महाभारतस्य संक्षेपेण वर्णिता कथा एवं वर्तते - उत्तरभारतस्य
राज्ञो दुष्यन्तस्य पुत्रस्य भरतस्य वंशधरस्य शान्तनोः प्रपौत्रो
-धृतराष्टपाण्डवौ आस्ताम्। अग्रजन्मा धृतराष्टः नेत्रहीनः
इति हेतोः सर्वैः पाण्डुरेव राजसिंहासनेऽभिषिक्तः।
कालान्तरेण पाण्डुः पञ्चत्वं प्राप्तः। तदा पञ्चपाण्डवाः -
युधिष्ठिरः - भीमः - अर्जुनः - नकुलः - सहदेवश्च निखिलानि
शास्त्राणि वेदाञ्च अधीतवमन्तः । प्रकृतयः युधिष्ठिस्य
शौचेन, भीमसेनस्य धृत्या, अर्जुनस्य विक्रमेण, नकुलसहदेवयोः
गुरुशुश्रूषया, शान्त्या विनयेन च, समेषां तेषां शौर्यगुणेन च अति
सन्तुष्टा अभवन्।
पाण्डवानाम् अभ्युदयम् असहमानः दुर्योधनः छलेन तेषां राज्यम्
अपहर्तुं बहुकृतप्रयत्नोऽपि विफलोऽभवत्। तदा
स्वमातुलशकुनिसाहाय्येन घूतक्रीडायां कपटेन पाण्डवान्
पराजित्य द्रौपदीञ्च स्वानुजेन दुःशासनेन सभामानाय्य
अपमाननं कर्तुं प्रायतत । श्रीकृष्णेन रक्षिता द्रौपदी।
पराजिताः पाण्डवाः कृतसमयानुसारं द्वादशवर्षपर्यन्तं
वनवासस्य, एकवर्ष-अज्ञातवासस्य च कठिनाम् अवस्थाम्
असहन्। ततोऽरण्यात् निवृत्य स्वराज्यम् अयाचन्त । दौत्यार्थं
पाण्डवप्रतिनिधिः भूत्वा स्वयं श्रीकृष्णः गतः। परन्तु
स्वार्थपरायणः दुर्योधनस्तु - ’केशव ! युद्धं विना
सुच्याग्रपरिमितं भूमिमपि न दास्यामि’ इति दृढचित्तः सन्
अवदत् ।
फलतः कौरव-पाण्डवानां मध्ये भयङ्करं युद्धं सञ्जातम्।
कौरवाः पराजिताः, पाण्डवेषु ज्येष्ठः युधिष्ठिरः
राजसिंहासनम् आरोहत् । कालक्रमेण अभिमन्योः पुत्रं
परीक्षितं हस्तिनापुरस्य अधिपतिनं विधाय सर्वे पाण्डवाः
द्रौपदी च हिमालयं प्रति अगच्छन् -तत्रैव कालकवलतां गताश्च।
महाभारतस्यादरः-----
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रामायणस्य तुलनायां यद्यपि महाभारतस्य प्रचारः अल्पः
तथापि महत्त्वदृष्ट्या महाभारतं विश्वस्य कस्मादपि
ग्रन्थान्न हीयते । महाभारतं तदानीन्तनभारतीय
समाजनीतिप्रभृतिज्ञातव्यं बोधयति, महाभारतं तदानीन्तनीं
भारतीयां सभ्यतां प्रकाशयति । प्रमाणग्रन्थतयैवास्य
पञ्चमवेदसंज्ञा जाता । यथा रामायणाधारेण बहवो ग्रन्था
अरच्यन्त तथैव महाभारताधारेणापि । एतत् सर्वमस्य ग्रन्थस्य
महत्त्वे साक्षिभूतम् । word gedacht
महाभारतस्य विभागाः-----
=========================
महाभारतमष्टादशसु पर्वसु विभक्तं वर्त्तते, तस्मिंश्च आदि-
सभा-वन-विराट-उद्योग-भीष्म-द्रोण-कर्ण-शल्य-सौप्तिक-
स्त्री-शान्ति-अनुशासन-अश्वमेध-आश्रमवासि-महाप्रास्था
निक –स्वर्गारोहणपर्वणि सन्ति ।
अनुषङ्गतः शकुन्तलोपाख्यान –मत्स्योपाख्यान –
रामोपाख्यान-शिबिकथा-सावित्रीकथा-नलोपाख्यानाद
ीनि वर्णितानि । युद्धवर्णनमात्रं न व्यासस्य लक्ष्यमपि तु
भौतिकजीवनस्यासारतां प्रकाश्य प्राणिनां मोक्षमार्गे
प्रवर्त्तनमेव व्यासस्य महाभारतप्रणयने उद्देश्यमासीत्, अत
एवात्र शान्तो रसः प्रधानभूतः वीरस्तु रसोऽङ्गभावं गतः ।
क्र.सं I पर्व I अध्यायाः I श्लोकाः
(१.) I आदिपर्व I २२७ I ८८८४
(२.) I सभापर्व I ७८ I २५५१
(३.) I वनपर्व I २६९ I ११६६४
(४.) I विराटपर्व I ६७ I २०५०
(५.) I उद्योगपर्व I १८६ I ६६९८
(६.) I भीष्मपर्व I ११७ I ५८८४
(७.) I द्रोणपर्व I १७० I ८९०९
(८.) I कर्णपर्व I ६९ I ४९६४
(९.) I शल्यपर्व I ५९ I ३२२०
(१०.) I सौप्तिकपर्व I १८ I ८७०
(११.) I स्त्रीपर्व I २७ I ७७५
(१२.) I शान्तिपर्व I ३३९ I ४७३२
(१३.) I अनुशासनपर्व I १४६ I ८०००
(१४.) I अश्वमेधपर्व I १०३ I ३३२०
(१५.) I आश्रमवासिकपर्व I ४२ I १५०६
(१६.) I मौसलपर्व I ८ I ३२०
(१७.) I महाप्रस्थानिकपर्व I ३ I ३२०
(१८.) I स्वर्गारोहणपर्व I ५ I २०१
(१९.) I हरिवंशः I ३ I १२०००
हरिवंशोनाम खिलपर्वापि योजयित्वा आहत्य १९३६
अध्यायाः १६८३६ श्लोकाश्च सन्ति महाभारते।अस्मिन्
महाभारते एव विदुरनीतिः सनत्सुजातीयम् भगवद्गीता अनुगीत
चेति चत्वारः तत्त्वोपदेशग्रन्थाः भवन्ति। विदुरनीतिः
द्योगपर्वणि ३३ तः ४० अध्यायपर्यन्तम् भवति। सनत्सुजातीयं
द्योगपर्वणि ४९ तः ४६, पर्यन्तम् भगवद्गीता भीष्मपर्वणि २५
तः ४२ पर्यन्तम् अनुगीता अश्वमोधीकपर्वणि १६ तः५१ पर्यन्तम्
च वर्तते।
महाभारतस्य वैशिष्ट्यम् :----
========================
व्यासस्य कृतिरियं सर्वैरितिहास इत्युच्यते यतोऽत्र वीराणां
पुण्या गाथा वर्णिता । अयं ग्रन्थो धार्मिकग्रन्थो येन लोकः
स्वकल्याणं गवेषयति । अत्रैव ग्रन्थे गीतारत्नं विद्यते या दुग्धेव
प्रतीयतेऽनवरतं दुह्यमानाऽपि । गीताग्रन्थस्यादरो
महाभारतस्यैव विशिष्टतां प्रमाणयति । स्वयमेव व्यासेन
महाभारतस्य प्रशंसायां यदुक्तं तदक्षरशः सत्यम् –
यो विद्याच्चतुरो वेदान् साङ्गोपनिषदो द्विजः ।
न चाख्यानमिदं विद्यान्नैव स स्याद्विचक्षणः॥
श्रुत्वा त्विदमुपाख्यानं श्राव्यमन्यत्र रोचते ।
पुंस्कोकिलागरं श्रुत्वा रुक्षा ध्वंक्षस्य वागिव ॥
श्रीवेदव्यासस्य महत्वाकाङ्क्षेयं यद् धर्मार्थ-काम-मोक्ष-
विषयकम् अखिलमपि जिज्ञासितं तथ्यम् अत्रैव लभेत, न च
किञ्चिद् उच्छिष्येत इति । अतैव उच्यते -
धर्मे चार्थे च कामे च मोक्षे च भरतर्षभम्।
यदिहास्ति तदन्यत्र यन्नेहास्ति न तत् क्वचित्॥
महनीयोऽयं ग्रन्थः यथा वपुषा विशालः तथैव भावगाम्भीर्येण
अर्थगौरवेण च। अतैव उच्यते -
महत्वाद् भारवत्वाच्च महाभारतमुच्यते। महाभारतं विरचय्य
श्रीव्यासः ’शिष्येभ्यः कथम् अध्यापयामि’ इति यथा
चिन्तामग्नः आसीत् तदा तस्य व्यथां ज्ञात्वा स्वयं लोकगुरुः
भगवान् ब्रह्मा तस्य प्रीत्यर्थं लोकानां हितकाम्यया च तत्र
आगच्छत्। यथाविधि तस्योपचारं कृत्वा स्वयं श्रीव्यासः
स्वग्रन्थविषयेऽवदत् - ’भगवान् ! मया इदं परमपूज्यं काव्यं कृतम् ।
अस्मिन् काव्ये वेदरहस्यं साङ्गोपनिषदां विषयः च विस्तारेण
वर्णितः । इतिहासाः - पुराणानि - भूतं -भव्यं - भविष्यं, जरा-
मृत्यु-भय-व्याधि-भावाभावः, चातुर्वर्ण्यविधानं वर्ण्यधर्माः,
पृथिवी - चन्द्रः - सूर्यः - तारागणः ग्रहप्रमाणाः, सत्य-
त्रेता-द्वापर-कलियुगाः, ऋग्-यजुस्-सामानि सर्वमपि
वर्णितम्। तीर्थानां पुण्यक्षेत्राणां च कीर्तनं, नदी-वन-पर्वत-
सागरादीनां वर्णनं, सर्वमपि प्रतिपादितं विद्यते अस्मिन्
ग्रन्त्थे । परन्तु एतस्य ग्रन्थस्य कोऽपि लेखकः भुवि न विद्यते।
ब्रह्मा अपि प्रत्युत्तरे - 'अन्य कोऽपि अस्मात् श्रेष्ठतरं काव्यं
लेखितुं न समर्थो भवति । लेखनार्थं श्रीगणेशं स्मर' इति उक्त्वा
स्वधाम अगच्छत् । एवं महाभारतं श्रीव्यासेन प्रणीतं, श्रीगणेशेन
लिखितम्।
महाभारतस्य विविधविषयावगाहि - ज्ञानम्, अर्थगौरवं
भावगाम्भीर्यं च प्रतिपादयितुं कतिपयानि सुभाषितानि
उपस्थाप्यन्ते -
दार्शनिकभावोपेताः सूक्तयः
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नवहारमिदं वेश्म, त्रिस्थूणं पञ्चसाक्षिकम्, क्षेत्रज्ञाधिष्टितं
(क्षेत्रज्ञ-अधिष्टितं) यो विद्वान् वेद स परः कविः ।
अङ्गुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा लिङ्गस्य योगेन च नित्यं याति
- तम् इशम् - ईड्यम् -अनुकध्पम् - अद्यं - विराजमानं तं मूढाः न
पश्यन्ति।
नीतिशिक्षाविषयकाणि सुभाषितानि :----
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यस्मिन् यथा वर्तते यो मनुष्यः - तस्मिन् तथा वर्तितव्यं सधर्मः
मायाचारो मायया वर्तितव्यः, साध्वाचारः साधुना
प्रत्युपेयः
वृशं यत्नेन संरशेत् - वित्तमेति च याति च।
अक्षीणो वित्ततः, क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः।
न च दुर्बलोऽपि क्षत्रुः बलीयसा अवज्ञेयः
अल्पोऽपि दहत्यग्निः विषमल्पं हिनस्ति च।
अर्थशास्त्रीयाः सूक्तयः -----
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धनमाहुः परं धर्मं, धने सर्वं प्रतिष्ठितम्।
जीवन्ति धनिनो लोके, मृताः ये त्वधनो नराः॥
धनान् कुलं प्रभवति, धनान् धर्मः प्रवर्धते।
नाधनस्यास्त्ययं लोको, न परः, पुरुषोत्तमः॥
राजनीतिविषयकाः सूक्तयः---
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राजा प्रजानां प्रथमं शरीरं - प्रजाश्च राज्ञोऽप्रतिमं शरीरम्।
राज्ञा विहीना न भवन्ति देशा, देशैर्विहीना न नृपा भवन्ति॥
राज्ञा हि पूजितो धर्मस्ततः सर्वत्र पूज्यते।
यद् यदाचरते राजा तत् प्रजाभ्यः स्म रोचते॥
एवं गुणगौरवात् सर्वविषयावगाहित्वात् आचारशिक्षणात्
पावनत्वात् अयं महाभारतग्रन्थः पञ्चमो वेदः इति ख्यातः।
अत एव ग्रन्थश्चयित। - स्वगुणगौरवात् -त्रिदेववद् आद्रियते
सम्मान्यते च -
अचतुर्वदनो ब्रह्मा हिबाहुरपरो हरिः।
अभाललोचनः शम्भुः भगवान् बादरायणः॥
वेदानां धर्मप्रधानत्वाद्, यज्ञादिकर्मकाण्डप्रतिपादनात्
अध्यात्मभावविवरणाच्च न समेषां प्रियत्वम्। वेदेषु
द्विजानामेव विशिष्टा गतिः, धर्मत्वेन अभिरुचिश्च। परन्तु
महाभारते सर्वेषां कृते किमपि अस्ति। सर्वमनोमोहनत्वाच्च
एतद् स्त्रीशूद्रादिभ्यः अपि सुलभः। अस्य पावनत्वम्,
उत्कृष्टत्वं, सर्वार्थसाधकत्वं, सर्वेभ्यः सुलभत्वञ्च प्रेक्ष्य
विपश्चिद्भि - पञ्चमो वेदः ’महाभारतम्’ इति साह्लादम्
उद्घोष्यते। अष्टादश पर्वेषु, अनेकोपपर्वेषु च विभक्तम्
महाभारतम्। अस्य मुख्यांशाः - व्यासरहस्यम् - विदुरनीतिः -
भगवद्गीता च। श्री गणेशः - यदि मम लेखनी क्षणमपि
अलिखन्ती न अवतिष्टेत् - तर्हि अहं लेखको भवामि इत्यवदत् ।
तदा भगवान् व्यासः गूढं ग्रन्थग्रान्थिम् अरचयत् -
अष्टौ श्लोकसहस्राणि अष्टौ श्लोकशतानि च।
अहं वेद्मि, शुको वेति, सञ्जयो वेत्ति वा न वा॥
इति सन्देहः एव - अद्यापि तच्छ्लोककूटं सुदृढं ग्रथितं, गूढत्वात्
तस्य अर्थः केनापि भेत्तुं न शक्यते। अतः ’व्यासरहस्यम्’ इति
ज्ञातम्। विदुरनीतिः - विदुरेण मोहग्रस्तं, दुःखितम्, अशान्तं
धृतराष्ट्रं प्रति उपदिष्टा राजनीतिः विदुरनीतिरिति
ख्याता। सत्यवक् विदुरः निष्पक्षपाततया धर्ममार्गद्योतक
ः प्रवर्तकश्चासीत्। ’प्रजागर’ नामके उपपर्वणि अष्टसु
अध्यायेषु विदुरनीतिः सङ्ग्रहरूपेण निरूपिताः।
विदुरस्योक्तिः न केवलं धृतराष्टम् उद्दिश्य उक्ताः, परन्तु
सर्वेषां व्यक्तिजीवने उपयोगार्हा एव। महाभारतरण भूमौ
मोहग्रस्तम् अर्जुनं प्रति - श्रीकृष्णेन उपदिष्टा भगवद्गीता
वर्तते। सर्वोत्कृष्ट विषयस्तु अस्मिन् - ’सरस्वत्याः वृष्टिः’ इति
यथोराशिविभूषिते महाभारते - अहितीयः, सर्वज्ञः,
सर्वशक्तिमान्, परमयोगेश्वरः, अचिन्त्यानन्त गुणगणसम्पन्नः
सृष्टि-स्थिति-प्रलयकारी, विचित्रलीलाविहारी,
भक्तवत्सलः, भक्तभक्तिमान्, भक्तसर्वस्वः,
निखिलरसामृतसिन्धुः, प्रेमघनविग्रहः, सच्चिदानन्दघनः
वासुदेवस्य भगवतः श्रीकृष्णस्य गुणगौरवस्य मनमोल्क मधुरगीतं
विद्यते - भीष्मपितामहेन उक्ते ’विष्णुसहस्रनाम’ स्तवे। एतत् सर्वं
मनसि निधाय एव उद्घोष्यते -
नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम्।
देवी सरस्वतीं व्यासं ततो जयमुदीरयेत्॥
अर्जुनसन्न्यासः सुभद्रा च'
अधुनातने जनजीवने :----
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संस्कृतस्य काव्यमिदम् अद्यापि जनजीवने सुविख्यातं,
प्रेरणाप्रदं च तिष्ठति। दूरदर्शने 'रामायण'धारावाहिन्याः
लोकप्रियताम् अनु महाभारतम् इति धारावाहिनी
प्रसारिता। बी.आर.चोपडावर्येण सृष्टा इयं धारावाहिनी
स्वस्य गभीराध्ययनपूर्णचित्रणात् सर्वान् आकर्षत् ।
दूरदर्शनयन्त्रे बहुवाहिनीभिः समृद्धे युगेऽस्मिन्नपि इयं
धारावाहिनी पुनः पुनः प्रसार्यते।

शिशुपालवधम्

शिशुपालवधम्
महाकविमाघः गुर्जरदेशे श्रीमाल नामकस्थाने
विशिष्टब्राह्मणपरिवारे जन्म लेभे । तस्य पितुः नाम ‘दत्तक’
आसीत्; किन्तु सःसर्वाश्रयः इति नामान्तरेणापि प्रसिध्दः
आसीत् । अस्य पितामहः ‘श्रीसुप्रभदेव’ नामाः; ‘श्रीवर्मल’
नाम्नः राज्ञः प्रधानसचिवः प्रधानसेनापतिश्चासीत् । इत्थं
महाकवेः माघस्य समयःसप्तमेशवीयशतकसस्य अन्तभागः
अष्टमशतकस्य आदिभागः वा स्वीकरणं सर्वथा युक्तितयुक्तं
स्यात् । महाभारतीयां कथमाश्रित्य विंशतिसर्गात्मकं
‘शिशुपालवध् महाकाव्यम्’ इत्येका एव कृतिः समुपलभ्यते माघस्य

महाभारतस्य सभापर्वस्य ३३ तमात् ४५ पर्यन्तेषु त्रयोदशसु
अध्यायेषु शिशुपालवधस्य कथा उपलभ्यते । इयं कथा
श्रीमदभागवतेऽपि दशमस्कन्धस्य ७४ तमेऽध्याये सूक्ष्मरुपेण वर्तते ।
अस्या विंशतिसर्गात्मकस्य शिशुपालवधमहाकाव्यस्य रचना तु
महाकविमाघेन महाभारतीयां कथामाश्रित्य विहिता । अनेके
श्लोकास्तु प्रायः महाभारतस्य श्लोकैः समम् एव दृश्यन्ते ।
तद्यथा –
आचार्यमृत्विजञ्चैव संयुजञ्च युधिष्ठिर ।
स्नातकं च प्रियं प्राहुः षडर्ध्यर्हान्नृपं तथा ॥
पशुवद् घातनं वा मे दहनं वा कटाग्निना ।
क्रियतां मूर्ध्नि वो न्यस्तं मयेदं सकलं पदम् ॥
अत्र महाभारतापेक्षया महाकाव्योपयोगिनः अनेके विषयाः
वर्णिताः; तृतीयसर्गात् त्रयोदशसर्गं यावत् भगवतः
श्रीकृष्णस्य ऐश्वर्य –प्रस्थान –वनविहार –जलक्रीडा-रैवतक
पर्वत-सन्ध्या-प्रातः- प्रकृत्यादिविषयाणां वर्णनानन्तरं
महाराजयुधिष्ठिरस्य राजसूययज्ञे श्रीकृष्णस्य आगमनं वर्णितम्

एतेन ज्ञायते यत् अस्य महाकाव्यस्य आधारः महाभारतीया
कथा एव, किन्तु शिशुपालस्य वधमित्यादिषु स्थलेषु कुत्रचित्
महाकवेः मौलिकचिन्तनेन कथाभेदोऽपि दृश्यते ।
संस्कृतसाहित्ये पाण्डित्यमयशैल्याः चरमोत्कर्षोदृश्यते
श्रीमाघे । कालिदासस्योपमा – भाभीरथी; भारवेरर्थगुरुता-
यमुना, दण्डिनः हर्षस्य वा पदललिता- सरस्वती तीर्थराजसदृशे
कविराजे श्रीमाघे विराजते ।
महाकविमाघेन प्रणीतं शिशुपालवधमहाकाव्यं विंशतिसर्गेषु
पूर्णं जातम् । तस्यैतिहासिकं वृत्तमधोलिखितमस्ति –
पाण्डवाः प्रथमवनवासदिवसावधिं प्रपूर्य इन्द्रप्रस्थनगर
ीं समधिकृतवन्त आसन् । भगवतः श्रीकृष्णस्य कृपया अर्जुनभीम-
नकुलसहदेवानाम्पराक्रमेण च धर्मराजयुधिष्ठिरेणा समग्रमपि
जम्बूद्वीपं विजित्य विपुलं धनमेकस्थीकृतम् । एवमतुलसाम्राज्यं
विपुलं वैभवञ्चावाप्य युधिष्ठिरो राजसूययज्ञं कर्तुमैच्छत् ।
प्रायः समग्रस्य जम्बूद्वीपस्य (एशियायाः) भगवतः
श्रीकृष्णस्यानुयायिनो विरोधिनश्च राजानो
यज्ञेऽस्मिन्नामन्त्रिता आसन् । यज्ञेऽस्मिन् भगवान्
श्रीकृष्णः सर्वकर्मद्रष्टा आसीत् । सर्वेऽपि राजानो
यज्ञकार्येषु योग्यतानुसारं भागं गृह्णन्ति स्म ।
ऎतिहासिकोऽयं यज्ञ आसीत् । अतीवमहत्सज्जया यज्ञः
सुसम्पन्नः । याज्ञिकाः ब्राह्मणाः दक्षिणादिना
सत्कृताः ।
ततः सदस्यपूजाया अवसरस्समुपस्थितः । शास्त्रानुसारेण
यज्ञसमाप्तौ गुणवतेऽर्ध्यप्रदानस्य नियमोऽस्ति । प्रतिष्ठेयं
कस्मै प्रदेया ? विषयेऽस्मिन् पप्रच्छ युधिष्ठिरो भीष्मम् ।
शास्त्रानुसारं षडङ्गवेदाध्ययनाध्यापनरतो ब्राह्मणस्नातकः,
गुरुः बन्धुः, जामाता, राजा, ऋत्विग्, याज्ञिकश्चैते षट्
सदस्याः पूजनार्हाः भवन्ति । यदि कश्चन सर्वगुणसम्पन्नः
स्यात्तर्हि सोऽपि पूजनार्हो भवति । भीष्मोऽस्यै प्रतिष्ठायै
भगवान् श्रीकृष्ण एव महत्तम् इत्युद्घोषितवान् । युधिष्ठिरश्च
भगवन्तं श्रीकृष्णमेव पूजयामास ।
शिशुपालो भगवतः श्रीकृष्णस्येदं सम्मानं द्रष्टुं नाशकत । स
क्रोधाविष्टः रक्तीकृतनेत्रेश्च् सन् उच्चमुष्णञ्च श्वसितुमारेभे ।
धर्मराजं युधिष्ठिरं च निन्दित्वा भगवतः श्रीकृष्णस्योपर
ि नानाविधानाक्षेपान् कर्तुं प्रवृत्तः । भगवान् श्रीकृष्णः
मौनावलम्बितः सन् मनसैव शिशुपालस्यापराधान् गणयति स्म ।
भीष्मः शिशुपालस्येदं धाष्टर्थं सोढुं नाशकत् तन्मुखाच्च
भगवतः श्रीकृष्णस्य निन्दां श्रुत्वा सः क्षुब्धः सञ्जातः ।
तेनोक्तम् – “ अद्य मया विहिता भगवतः श्रीकृष्णस्य पूजा न
यस्मै रोचते सः धनुर्धारयेत्” । इत्युक्ते भीष्मे शिशुपालसमर्थकाः
राजानो यज्ञमण्डपाद् बहिर्गन्तुमुद्यता बभूवुः । शिशुपालः
पुनः कठोराणि वचांसि उवाच, तत्स्थानाच्च निः सृत्य
भगवन्तं श्रीकृष्णं युध्दार्थमाहूय चमूः सज्जां कर्तुमारेभे ।
पाण्डवास्तत्पक्षिणश्च राजानः शान्ता आसन् । चमूसज्जां
विधाय शिशुपालेन राजसभायां स्वकीयो दूतः प्रेषितः । स
दूतः श्लिष्टशब्दैर्भगवन्तं श्रीकृष्णं निन्दयामास । भगवतः
श्रीकृष्णस्य प्रेरणया सात्यकिस्तस्याक्षेपाणामुचितमुत
्तरम्प्रादात्, तथापि सोऽनेकान्यापत्तिजनकानि
वचांस्यकथयत् । अनेन भगवान् श्रीकृष्णस्तत्समर्थकाः
राजानश्चचाऽत्यन्तं क्रुध्दाः सञ्जाताः । अन्ते च युध्दः
प्रारब्ध एव । शिशुपालस्य सम्पूर्णाऽपि चमूर्नष्टा । चम्वां
विनष्टायां सत्यां सः स्वयं भगवता श्रीकृष्णेन साकं
योध्दुमारेभे । यद्ध्यमानः सः श्रान्तो भूत्वा कठोराणि
वचांस्यवदत् । ततः शकसंख्यकेष्व पराधेषु पूर्णेषु, तद्वधेऽधिकं
विलम्बमनुचितम्मत्वा भगवान् श्रीकृष्णः सुदर्शनचक्रेण
शिशुपालस्य शिरश्चिच्छेद अस्मिन्नेव समये तस्य
शरीरादेकस्तेजः समूहो निः सृत्य भगवतः श्रीकृष्णस्य
शरीरेऽन्तर्हितः । सर्वे चानया घटनया विस्मिताः बभूवुः ।
महाकविमाघेन २० सर्गात्मके स्वीये शिशुपालवधे महाकाव्ये
सर्वेषामेव रसानां साधिकारं सहृदयपरितोषं कुर्वता प्राधान्येन
वीररसः तदङ्गतया च सर्वेऽन्ये रसाः यथास्थानं विन्यस्ताः ।
रैवतक्- सूर्यास्त –सागरवर्णनमित्यादिस्थलानि अस्य
प्रकृतिप्रियतां प्रतिपादयन्ति । यथा – रैवतकपर्वतवर्णने –
उदयति विततोर्ध्वरश्मिरज्जावहिमरुचौ हिमधाम्नि याति
चास्तम् ।
वहति गिरिरयं विलम्बिघण्टा- द्वयपरिवारितवार
णेन्द्र्लीलाम् ॥
अस्य कृतौ प्रायः कोऽपि श्लोकः अलङ्काररहितो न दृश्यते ।
प्रायशः षोडशविधानां छन्दसां प्रयोगः कृतः महाकविना,
तत्रापि पञ्चमसर्गीयायाः वसन्ततिलकायाः
एकादशसर्गीयायाः मामिन्याः सौषम्यं सर्वातिशायि
संशोभते । कवित्वकौशलस्य चूडान्तनिदर्शनं महाकाव्यमिदम् ।
यथा, द्र्ष्टव्यं पद्यमिदं –
मधुरया मधुबोधितमाधवीमधुसमृध्दिसमेधितमेधया ।
इत्थं ज्ञातुं शक्यते यत् सर्वत्र नवनवां शब्दराशिं वितन्वन् असौ
नवसर्गेषु कविनामन्येषां कृते शब्ददारिद्रयं विहितवान् ।

-: अभिज्ञानशाकुन्तलस्य कथा :--

!!!---: अभिज्ञानशाकुन्तलस्य कथा :---!!!
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पुरुवंशस्य राजा दुष्यन्तः कदाचित् मृगयां कुर्वन् अटव्यां हरिणं
अनुधावन् मालिनीतीरे विद्यमानस्य कण्वस्य आश्रमं प्रविशति
। कण्वः फलपुष्पाणि आनेतुं गत इत्यतः काचित् सुन्दरी
तापसकन्या तस्मै स्वागतं करोति । अर्घ्यपाद्यादिभ
िः सत्करोति सा । तस्याः रूपेण मोहितः दुष्यन्तः स्वपरिचयं
तस्यै कुर्वन् तां प्रति - त्वं क्षत्रियोऽसि ? त्वां प्रति मम मनः
आकर्षति । अहं त्वां कामये इत्यवदत् । शकुन्तला तु - अहं
मेनकाविश्वामित्रयोः पुत्री इति, ताभ्यां यदा परित्यक्ताहं
शकुन्तपक्षिभिः रक्षिता इति, ततः कण्वमहर्षिः वने मां
दृष्ट्वा आश्रमं प्रति आनीय पोषितवान् इति ।
शकुन्तपक्षिभिः रक्षिता अहं शकुन्तला इति नामधेयं
प्राप्नवम्। यदि मां वोढुं वाञ्छसि तर्हि कण्वमहर्षेः अनुमतिः
अपेक्षिता इत्यादिकं सर्वं वृत्तान्तम् अकथयत् ।
दुष्यन्तः तु क्षत्रियाः गान्धर्वविधिना परिणेतुं शक्नुवन्ति ।
तदर्थं कण्वस्य आक्षेपः न स्यादिति, त्वयि जायमानमेव
उत्तराधिकारिरूपेण ताम् अङ्गीकारयित्वा तस्याः पुत्रमेव
युवराजं करिष्यामि इति प्रतिश्रुण्वानः तां परिणीतवान् ।
अग्रे तस्यै राजयोग्यानि वेषभूषणानि सेवकद्वारा प्रेषयामि
इति उक्त्वा कण्व मम विषये किं वदेत् इति चिन्तयन्नेव स्वनगरं
प्रायात्।
कण्वे आश्रमं प्रत्यागते शकुन्तला तस्य शिरसः उपरि विद्यमानं
भारम् अवतारयति । तथापि तस्य मुखं अदृष्ट्वा लज्जया
अधोमुखी तिष्ठति । कण्वे लज्जायाः कारणं पृच्छति सति
शकुन्तला दुश्यन्तेन साकं कृतविवाहवृत्तन्तं अकथयत् ।
दिव्यदृष्ट्या सर्वविदितः कण्वः - ”वत्से ! त्वया कृतः अधर्मः
न । क्षत्रियाणां गान्धर्वविधिना परिणयः सम्मतः” इति
समर्थयति । कालक्रमेण गर्भवती शकुन्तला रूपगुणसम्पन्नोपेतं सुतं
असूत । पुत्रस्य षट् वर्षाणि अतीतानि चेदपि दुष्यन्तः नागतः ।
सः अपि आरम्भदिनेषु कण्वः किमपि वदेत् इति चिन्तयन् न
प्रवर्तते स्म, क्रमेण शकुन्तलायाः विषयः तेन विस्मृतः । परं सा
तु तं निरीक्षमाणा खिद्यते स्म । बालस्तु धीरः सन् वनस्य
सर्वप्राणिनः अपि निगृह्य आत्मानं "सर्वदमन" इति
परिचाययति स्म । तं यौवराज्याय अर्हं मन्वानः कण्वः मुहूर्तं
निश्चित्य स्वशिष्यैः सह शकुन्तलां तत्पुत्रं च दुष्यन्तस्य
राजधानीं प्रति प्रेषयामास ।
शोकाकुला शकुन्तला
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यदा शकुन्तला पतिगृहं प्रस्थिता तदा पालितपितुः कण्वस्य
नेत्रे अश्रुपूर्णे भवतः । तच्छिष्याः तां राजधानीं प्रापय्य
प्रत्यागच्छन्ति । पुत्रेण सह शकुन्तला राजसभायां दुष्यन्तं
दृष्ट्वा स्ववृत्तान्तं सर्वं निवेदयति । तस्याः वचनेन स्मृतपूर्ववृत्त
ान्तः राजा अपि लोकापवादात् भीतः अहं किमपि नजाने
इति वदति । तामुद्दिश्य - शकुन्तले ! का त्वम् ? कुतः अत्र आगतं
त्वया ? किं साहाय्यम् अपेक्षितम् ? इति अपरिचितः इव
सम्भाषते । ततः शकुन्तला - "महाराज ! अयं तव पुत्रः । त्वया
आश्रमे दत्तवचनानुसारं तव राज्यस्य उत्तराधिकारी भविता ।
यदा त्वया आश्रमं प्रति आगतं तदा प्रवृत्तं सर्वं स्मर" इत्यादि
रीत्या अभियाचते । दुष्यन्तः शकुन्तलां न विस्मृतवान् आसीत्
परं तस्मिन् क्षणॆ किमपि अजानन् इव -
"धर्मार्थकामसम्बन्धं न स्मरामि त्वया सह ।
गच्छ वा तिष्ठ वा कामं यद्वापीच्छसि तत् कुरु ॥"
अस्य तात्पर्यमेतत् - धर्मार्थकामार्थं त्वया सह सम्बन्धकरणं न
मया स्मर्यते । त्वं याहि, अत्रैव तिष्ठ स्वेच्छानुसारं वा कर्म कुरु
इति साक्षात् वदति । शकुन्तला अवमानेन लज्जया च पीडिता
क्षणं यावत् किङ्कर्तव्यमूढा तिष्ठति । तदा नितरां कुपिता
सा दुष्यन्तं सम्यक् निर्भत्सयन्ती- "महाराज ! जानन्नपि कुतः
एवं प्रलपसि ? एवम् असत्यं कथयन् त्वं हृदि संस्थितं सर्वसाक्षिणं
परमात्मानं मा अवमानय । अहं तव धर्मपत्नी । यदि मां त्यजसि
न किमपि दुःखम्, परं एतं तव पुत्रं मा त्यज । मम वचनं यदि उपेक्षसे
तर्हि तव शिरः सहस्रशः छिद्रं भविष्यति" इत्यादिभिः वचनैः
भर्त्सयति । तथापि दुष्यन्तस्य मनः न द्रवति । पूर्वतनं किमपि न
स्मरन् सः अन्ते तामेव "वेश्यापुत्रि !" इति निन्दति ।
शकुन्तलायाः नयविनयादिभिः याचनादिभिः अपि
दुष्यन्तः नाङ्गीकरोति । तदा सा कोपाग्निम् असहमाना
पुत्रेण सह ततः निर्गता । तावता - "भरस्व पुत्रं दुष्यन्त !
मावमंस्थाः शकुन्तलाम्" (हे दुष्यन्त ! अयं तव पुत्रः, तं पोषय ।
शकुन्तलायाः अवमाननं मा कुरु) इति अशरीरवाणी काचित्
भविष्यति, शकुन्तलायाः उपरि पुष्पवृष्टिः च भविष्यति । ततः
दुष्यन्तः सिंहासनात् अवतीर्य अन्तरिक्षदेवताः नमस्कृत्य
राजसभायां मन्त्रिपुरोहितं च उद्दिश्य - "अहं तु एतां जाया
इति, अयं तव पुत्रः इति सम्यक् एव अभिज्ञातवान् अधुना
अशरीरवाणी जाता इत्यतः अयं पुत्रः मदीयः शुद्धः इति
निःशङ्कं कथयामि इति वदन् तम् आलिङ्गितवान्, शकुन्तलां च
आदरेण सत्कृतवान् । सर्वदमनः युवराजपदे नियुक्तः सन् अग्रे भरतः
इति प्रसिद्धिम् अवाप । शकुन्तला पट्टमहिषी सञ्जाता ।
शकुन्तलादुष्यन्तयोः कथा पुराणकाले अतीव प्रसिद्धः स्यात्
अतः इयं कथा न केवलं महाभारते, भागवते, विष्णुपुराणे, हरिवंशे,
मत्स्यपुराणे, वायुपुराणे, पद्मपुराणे च दृश्यते । बौद्धानां
जातककथायामपि शकुन्तलाकथासदृशी अपरा काचित् कथा
विद्यते । जैनसम्प्रदायेऽपि (पार्श्वनाथचरित्रम्) कालिदासस्य
शाकुन्तलनाटकसदृशी अन्य कथा दृश्यते । एतैः अंशैः
शकुन्तलादुष्यन्तयोः कथा अनादिकालात् अपि प्रचलिता
इति ज्ञायते ।
कालिदासस्य नाटकस्य कथायाः महाभारते उक्तायाः
कथायाः च तुलनां कुर्मः चेत् अत्र कालिदासस्य
रचनाकौशल्यम् उदात्तं रचनात्मकं च परिवर्तनं दृश्यते ।
कालिदासेन ग्रथितस्य अभिज्ञानशाकुन्तलस्य प्रथमाङ्कः
कण्वस्य अश्रमस्य दृश्यम् । तस्य आरम्भः अष्टमूर्तेः शिवस्य
स्तवनेन भवति । ततः सूत्रधारः नट्या सह रङ्गं प्रविश्य ग्रीष्म-
ऋतुवर्णनद्वारा सङ्गीतस्वादम् अनुभवति । नवीनतया रचितस्य
कालिदासस्य नाटकस्य परिचयं कारयति । तदनन्तरं दुष्यन्तः
हरिणम् अनुधावन् आगच्छन्नस्ति इति घटनां संसूच्य प्रस्तावनं
समाप्य निर्गच्छति ।
ततः दुष्यन्तः कञ्चित् हरिणं अनुधावन् राजा दुष्यन्तः रथं
वाहयन् सूतश्च प्रविशतः । दुष्यन्तः यावत् हरिणस्य उपरि बाणं
प्रयोक्तुं सिद्धः तावता आश्रमस्य तपस्विनः आगत्य - "राजन् !
आश्रममृगोऽयं मा हन्यताम्" इति वदन्ति । समीपे विद्यमानं
कण्वस्य आश्रमं प्रदर्श्य तत्र कण्वः अधुना आश्रमे नास्ति, परं
कण्वदुहिता शकुन्तला तव सत्कारं करिष्यति गत्वा
अतिथिसत्कारं स्वीकृत्य गच्छ इति सूचयन्ति । दुष्यन्तः स्वयम्
एकाकी आश्रमं प्रति गच्छति । तत्रा तिसृभिः
तापसकन्यकाभिः वृक्षेभ्यः जलं सिच्यमानम् असीत् । तासां
मधुराणि सम्भाषणानि प्रच्छन्नः स्थित्वैव शृणोति । तासु
तिसृषु अन्यतमायाः शकुन्तलायाः अप्रतिमं सौन्दर्यं विलोक्य
विस्मितः भवति राजा । तस्याः अव्याजमनोहरं सौन्दर्यं
स्वदते सः । तासां पुरतः आत्मानं दर्शयितुं समयं प्रतीक्षमाणः
भवति । तावता कश्चन भ्रमरः शकुन्तलां पीडयन् भवति । तदा
राजा आत्मनः प्रकटनाय अयं समुचितः कालः इति चिन्तयन्
तद्दूरीकरणाय सः प्रविशति । तयोः सख्योः सम्भाषणेन
शकुन्तला विश्वामित्रमेनकयोः पुत्रीति, ताभ्यां परित्यक्ता
शकुन्तपक्षिभिः वने पोषितां तां कण्वमहर्षिः आश्रमं प्रति
आनीय तां पोषयन् अस्ति इत्यादिविषयान् ज्ञात्वा राजा
सन्तुष्टः भवति । एषा क्षत्रियकन्या, मया परिणेतुं योग्या इति
चिन्तयन् मनसि हृष्टः भवति ।