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06 June 2012

सुत्राणि कतिविधानि?


सुत्राणि कतिविधानि

पणिनीविरचितसूत्राणि षड्विधानि सन्ति।यथोच्यते-----

संज्ञा च परिभाषा च विधिर्नियं एव च।
अतिदेशोऽधिकारश्च षड्विधं सूत्रलक्षणम्॥


१.संज्ञा सूत्रम्




संज्ञा  संज्ञिनि  बोधकं सुत्रम् उच्यते संज्ञासूत्रं। व्याकरणे पाणिनिना शास्त्रप्रक्रियानिर्वाहाय टिलघुदीर्घवृद्धिगुणादयः संज्ञा  कृतास्सन्ति ।यथा--अचोन्त्यादि टि,भूवादयो धातवः,वृद्धिरादैच्, अदेङ्गुणः इत्यादयः।


अर्थात् संज्ञा एवं संज्ञा का ज्ञान कराने वाले सूत्र संज्ञासूत्र है।

२.परिभाषा सूत्र

"अनियमे नियमकारिणी परिभाषा" ।
अर्थात्--अनियम की स्थिति मे नियम की व्यवस्था करने वाला सूत्र " परिभाषासूत्र " है|
यथा--तस्मिन्नितिनिर्दिष्टे पूर्वस्य,अलोऽन्तस्य






३.विधिसूत्रम्

"आदेशादिविधायकं सूत्रं विधिसूत्रं "।
आदेशादि का विधान करने वाला सूत्र "विधिसूत्र"है।
यथा--आदगुणः,वृद्धिरेचि,इकोयणचि इत्यादयः।

४.नियमसूत्रम्

"प्राप्तस्य विधेः नियामकं सूत्रं नियमसूत्रम्"।
प्राप्तविधि के विषय में नियमन करने वाला सूत्र "नियमसूत्र"है।
यथा--रात्सस्य

५.अतिदेशसूत्रम्

"अतस्मिन् तद्धर्मापादकं सूत्रम् अतिदेशसूत्रम्"।
जो वस्तु वैसा नहीं है उसमें वैसे धर्म का आरोप करने वाला सूत्र "अतिदेशसूत्र" है।
यथा--स्थानिवदादेशोनल्विधौ ।

६.अधिकारसूत्रम्

"उत्तरोत्तरसूत्रेषु स्वघटकपदसंपर्कं सूत्रम् "अधिकारसूत्रम्"।
आगे के सूत्रों में किसी पूर्व सूत्र के पद को ले जाना "अधिकारसूत्र"है।
यथा--स्त्रियाम्,कारके इत्यादि।

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